ख़ामोशी से सब कह देने वाले ,
ये हुनर आया ,कहाँ से ?
जुबाँ से तो हम कह न सके ,
बिन बोले ही ,समझाना.....
आया कहाँ से...... ?
ख़ामोशी से ,कुछ देर ,
ठहरकर चली गयी ;
अभी आई थी ,अभी चली गयी।
उसकी वो मुस्कुराहट.....
न जाने कितने ग़म दबा गयी ?
दर्द की हद तो देखिये !
वो भी ख़ामोश हो गया।
किसी से ,कहें भी तो क्या ?
अपना ही बनकर रह गया।
