Nakl

 क्या बताऊँ दोस्तों !व्यस्तता बहुत चल रही है ,अभी'' बेचारी ''धारावाहिक समाप्त किया। दो अभी भी चल रहे हैं ,और घर के भी कार्य हैं। सब कुछ सोच -समझकर लिखना पड़ता है। इसकी कोई '' गाइड ''नहीं होती कि उसमें से देखो ,और नक़ल करके कुछ भी  लिख दो। अरे हाँ !नकल से याद आया। नकल भी ऐसे ही नहीं होती। नकल भी सोच समझकर करनी पड़ती है ,यानि ''नकल के लिए भी अक़्ल चाहिए। ''

तभी कृतिका जी ने प्रवेश किया और बोलीं -किस विषय में बातें हो रही हैं ?


हम क्या बातें करेंगे ?मैं तो ये कह रही थी कि पहली बात तो किसी की नकल करनी ही नहीं चाहिए। यदि नकल की भी तो ,अक़्ल से  करनी चाहिए। 

ये क्या बात कही ,आपने भाभी जी ,यदि उसे अक़्ल होगी तो कोई नकल ही क्यों करेगा ?रेनुजी तपाक से बोलीं।

ये भी बात सही है। किन्तु आजकल फैशन से लेकर ,शिक्षा में कहीं भी किसी के ऊपर कोई भी चीज अच्छी लगती है तो नकल करने लग जाते हैं। 

तृप्ति ये बात सुनकर बहुत हंसी -शायद उसे कोई बात स्मरण  हो आई। 

क्यों तृप्ति जी ?आप इस तरह क्यों खिल रही हैं ?क्या कोई वाक्या स्मरण हो आया ?

हाँ जी ,इसीलिए तो हंस रही हूँ।  जब हमारी परीक्षा होती थीं ,तब हमारे 'प्रश्न पत्र ''के दो सेट बनते थे। ए और बी। कुछ बच्चों को सेट' ए 'मिलता था कुछ बच्चों को सेट 'बी 'मिलता था। ताकि बच्चे आपस में एक -दूसरे की कॉपी न कर सकें। मेरी कक्षा में एक लड़का था ,था तो बहुत ही सीधा -साधा ,मेरे सैक्शन में भी नहीं था किन्तु हम दोनों की कक्षा एक ही थी। जब हमारा पेपर होना आरम्भ हुआ ,मैंने लिखना आरम्भ कर दिया। वो भी लिख रहा था किन्तु पता नहीं कैसे ?मेरी कॉपी से ही नकल कर रहा था। मैंने पहले प्रश्न का उत्तर लिखा ,उसने भी लिखा। मैं देख तो रही थी कि वो मेरी कॉपी में ,नज़र मार रहा था किन्तु मैंने इतना ध्यान नहीं दिया क्योंकि मैं जानती थी -उसका सेट 'बी ' था। उसने अपना प्रश्न पत्र पढ़ने की जहमत ही नहीं उठाई और उसने जो भी देखा या  समझ आया ,उसने हूबहू मेरी कॉपी कर ली। अंत में ,मैंने अपनी कॉपी अध्यापिका दे दी। उन्होंने मेरी कॉपी देखी और जमा कर ली। मेरे पश्चात ही ,वो लड़का भी आ गया ,उसने भी कॉपी जमा की तब अध्यापिका ने उसकी कॉपी भी ऐसे ही पलटकर देखी। उन्हें कुछ गड़बड़ लगी उन्होंने उसका प्रश्न पत्र भी मंगवाया। देखा ,उस लड़के ने ,मेरे जैसे ही उत्तर लिखे हुए हैं ,अपने पेपर को तो उसने पढ़ा भी नहीं ,और उस भी बहुत गलतियां थीं ,तब अध्यापिका ने उसे डाँटा भी और पीटा भी। कहा  यदि तुम नकल ,कर ही रहे थे -तो थोड़ा सा दिमाग से भी काम ले लेते।

तभी दीप्ती बोली -इतना ही नहीं ,कभी -कभी लोग फैशन में भी ,दूसरे की नकल करने लगते हैं। पहले एक धारावाहिक आता था जिसमें एक पात्र थी ,'रमोला सिकन ' वो बहुत बड़ी -बड़ी बिंदियां लगाती थी ,हमारी ही एक पड़ोसन ,हूबहू उसकी नकल करती थी , साडी ,बिंदी और वो बिलकुल भी अच्छी नहीं लगती थी। जरूरी नहीं कि कोई चीज़ दूसरे के अच्छी लग रही है तो आपके भी अच्छी लगे। सबका अपना अलग व्यक्तित्व है ,लम्बाई -चौड़ाई ,चेहरा ,रूप -रंग तब एक ही जैसी चीज कैसे खिल सकती है ?इसे कहते हैं -''नक़लची बंदर ''कहते हुए कुछ सोचकर दीप्ती मुस्कुराने लगी। 

हमने सोचा -आज अपनी  इस सभा का यहीं अंत कर देना सही है, वरना आज ये लोग मस्ती में हैं ,पता नहीं क्या स्मरण हो  जाये ?न जाने ये दिल्ल्गी ,किसके दिल को लग जाये ?एक बात तो साफ है ,हर चीज की नकल जा सकती है किन्तु किसी के चरित्र उसके स्वभाव की नकल...... भी लोग अब करने लगे हैं किन्तु चरित्र की नकल नहीं हो सकती। बाकि तो आज के समय में सब सम्भव प्रतीत होता है। 


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

Post a Comment (0)
Previous Post Next Post