अभी तक आपने पढ़ा ,बरसात की एक रात्रि को ,शैलेश को एक सुंदर लड़की मिलती है ,उसे देखते ही ,शैलेश के मन में विवाह की इच्छा जाग्रत होती है। पता नहीं ,उसकी मुस्कान में ,ऐसा कैसा जादू है ?जो उससे ,बार -बार मिलने का मन करता है। आज भी वो मिली ,किन्तु अपना पर्स लेने आई थी ,या उसका भी मुझसे मिलने का कोई बहाना था ,उससे पहले तो ,शैलेश ने वहां कोई पर्स नहीं देखा। शैलेश सोचता है - यहां किसी पेड़ पर निशान लगा देता हूँ।निशान लगाकर, वो तो चला जाता है।
दूर कहीं पहाड़ी पर ,एक व्यक्ति ,जो अपनी जान के लिए तड़प रहा है ,दो तेज़ नुकीले दाँत उसकी गर्दन पर गड़े उसका खून चूस रहे थे। इस पहाड़ी पर , अक्सर ही ऐसा होता है किन्तु ये खबर इसीलिए नहीं फैल पाती। कोई इक्का -दुक्का ,उधर से निकलता और वो ही शिकार हो जाता। कई लोगों की गुमशुदगी की रिपोर्ट थाने तक पहुंची भी है किन्तु पुलिस आज तक ,कुछ भी नहीं कर पाई।
नंदिनी को बार -बार ,वो ही संदेश भेजे जा रहा था। अंततः वो उठती है और अपनी मम्मी कविता से कहती है -मम्मी ! मैं अपनी सहेली से मिलने जा रही हूँ और वो चली जाती है ,जहाँ उसने बुलाया था। आज या तो आर या पार सोचकर वो गयी थी। किसी तरह उसके बताये स्थान पर जा पहुंची। वो वहां उसी की प्रतीक्षा में पहले से ही खड़ा था। उसको देखकर ,बोला -आ गयीं ,मेरी जान.....
नंदिनी उसके सामने गिड़गिड़ाई और बोली -तुम्हें क्या चाहिए ?तुम जितने चाहो ,उतने पैसे मैं तुम्हें दे सकती हूँ।
जब मेरे पास पैसों का खज़ाना है तब कोई ,थोड़े बहुत पैसे क्यों लेगा ?यदि तुम चाहती हो ,मैं तुम्हारी वे तस्वीरें ,दुनिया को न दिखलाऊँ ,तो जैसा मैं कहता हूँ वैसा ही करना होगा।
जब मैं तुम्हें ,उनके पैसे देने के लिए तैयार हूँ ,फिर और क्या चाहिए ,तुम्हें....
मुझे तुम....... चाहिए तुम..... जिसे मैं इस बरसात के मौसम में अपनी रानी बना सकूँ।
अरे ,तुम क्या मुझे रानी बनाओगे ?तुम्हें तो मेरी ये देह ,अपने अहंकार को शांत करने के लिए चाहिए।
कुछ ऐसा ही समझ लो, उसने ढिटाई से कहा -यदि तुम मेरे प्रेम को पहले ही स्वीकार कर लेतीं तो आज ये दिन न देखना पड़ता।
ये तेरा कैसा प्रेम है ?जो जबरदस्ती अधिकार जता रहा है ,प्रेम ज़बरदस्ती का सौदा नहीं ,ये तो मन की भावनाएँ हैं ,जो स्वतः ही उभरकर आती हैं। प्रेम जबरदस्ती नहीं पाया जा सकता ,यदि तुम सोचते हो !तुम मेरे साथ ,ऐसा व्यवहार करके ,मुझसे जबरदस्ती करके ,मेरा प्रेम हासिल कर लोगे तो ऐसा कभी नहीं होगा। मैं तो उस दिन को कोसती हूँ जिस दिन उस लड़की के कहे पर ,उस ''पार्लर ''में गयी। मुझे नहीं मालूम था ,वो सब तुम्हारी चाल थी।
वो बैठा मुस्कुरा रहा था ,नंदिनी रोये जा रही थी ,इसे तुम प्यार कहते हो ,ये है,प्यार तुम्हारा..... तुम जैसे इंसान से कौन प्यार करेगा ?जो दूसरे को मजबूर करे।
मुझे क्या ,तुम यहाँ भाषण देने आई हो ?बताओ !मेरी ख्वाहिश कब पूरी कर रही हो ?वरना इसी तरह ,तुम्हारे सर पर तलवार लटकी रहेगी। आज आई हो तो ,आज ही क्यों नहीं ?बराबर में ही ,तो होटल है।
उसकी बात सुन ,रोते हुए भी, लगभग वो चीख़ी -तुषार..... भगवान ने शक्ल -सूरत तो अच्छी दी है ,किन्तु कर्म तो गुंडों ,मवालियों वाले हैं।
अभी तो मैंने ,कुछ किया ही नहीं ,ये सब करने पर भी ,तुमने ही तो मजबूर किया। मैंने तो तुमसे सीधे -सीधे प्यार का इज़हार किया और तुमने मेरे ही दोस्तों के सामने मेरी बेइज्जती कर डाली। वो बात स्मरण होते ही ,उसे फिर से क्रोध आ गया। तुम अपने -आपको समझती क्या हो ?कहीं की राजकुमारी हो ?अभी ये तुम्हारी सभी तस्वीरें ,फैला दूँ ,ये जो तुम इज्जत का जामा ओढ़े बैठी हो ,इसे तार -तार होने में तनिक भी समय नहीं लगेगा।वैसे इससे ,तुम्हारे रिश्ते तो बहुत आने लगेंगे।
उसकी बातें सुनकर ,तनिक देर के लिए ,रोती हुई नंदिनी एकाएक शांत हो गयी ,अपने आंसूं पोंछते हुए ,बोली -मुझे ,सोचने के लिए थोड़ा वक़्त दो।
कितना वक़्त ?मुझसे पीछा छुड़ाने के लिए ,तुम हॉस्टल से अपने घर भाग आईं ,क्या अपने मम्मी -पापा को बताया कि तुम क्यों आई हो ?
नहीं.... तभी नंदिनी ने ,घड़ी में समय देखा तो ,आठ बज रहे थे। भइया ,आ गए होंगे कहकर वो उठी और बोली -मैं शीघ्र ही तुम्हें उत्तर दूंगी ,किन्तु इस तरह मुझे ,ये संदेश भेजने बंद करो। हो सके ,तो इन्हें मिटा दो।
ये तो तभी मिटेंगे ,जब तुम्हारा उत्तर मिलेगा कहकर वो मुस्कुराया।
नंदिनी ने उसे घुरा और ऑटो में बैठकर चली गयी। वो उसे दूर तक जाते देखता रहा।
तुषार सोच रहा था -जब इसे पहली बार देखा था ,तभी कुछ अपनी सी लगने लगी थी। अक्सर उसे ,चुपचाप आते -जाते देखा करता। एक वर्ष तो ऐसे ही बीत गया ,अगले वर्ष सोचा -अबकि बार ,उससे कह दूंगा ,इस वर्ष एक नया लड़का उनके कॉलिज में आया ,जो नंदिनी पर नजर रखता था। कारण ऐसे बन जाते कांड वो करता ,नाम तुषार का आता। एक दिन नंदिनी ने उसका पक्ष लेते हुए कहा -तुषार तो इस कालिज में ,पिछले वर्ष भी था ,तब तो उसने कोई भी ऐसी ,,हरकत नहीं की ,इस वर्ष ही ऐसा क्या हुआ ?ये सब उसी नए लड़के के कारण हो रहा है। उस समय ,नंदिनी को अपना पक्ष लेते देख ,वो दिल ही दिल में ,उसे चाहने लगा और एक दिन उसने ,अपने प्यार का इज़हार कर भी दिया।
उसकी बात सुनकर ,वो जोर से हंसी और बोली -अरे -अरे !मेरे बहनों और भाइयों सुनो !ये महाशय ,मुझसे प्रेम करते हैं ,अपनी शक़्ल भी आईने में देखी है ,तुम जैसों को तो मैं ,अपने घर में नौकर भी न रखूँ।वो सबके सामने उसे इस तरह बेइज़्जत करके चली गयी ,सभी उस पर हंस रहे थे। उसने सपने में भी नहीं ,सोचा था -वो इस तरह उसके प्यार का मज़ाक बनायेगी ,उस दिन को स्मरण कर उसका क्रोध फिर से बढ़ गया और उसने उसे जाते देख ,घृणा से सड़क पर थूका।
नंदिनी की ऑटो जैसे ही घर के सामने रुकी ,तभी शैलेश की गाड़ी भी आ गयी। वो गाड़ी से उतरा और नंदिनी से पूछा -तुम इस वक़्त ,कहाँ से आ रही हो ?
अपनी एक सहेली के घर गयी थी ,अपने उदास चेहरे पर जबरदस्ती मुस्कुराहट लाते हुए बोली।
कविता ने दोनों को एकसाथ देखा प्रसन्न होते हुए बोली -आ गए ,तुम दोनों ,अब फ़टाफ़ट खाना खा लो।
सुबह सवेरे ,शैलेश उठा और अपनी दौड़ के लिए गया। आज वो मन ही मन प्रसन्न था आज वो पता लगा लेगा कि वो किधर जाती है ?वो रास्ता किस गांव अथवा शहर की तरफ जाता है ?वो शीघ्र से शीघ्र उसका पता लगाकर ,उसके परिवार से भी मिलना चाहता है और इतने उसके मन की बात भी जान लेगा। अफ़सोस ये है कि वो आते समय ही मिलती है ,जाते समय भी मिल जाये तो ,उसका दिन बन जाये।

