Barsat ki wo raat [part 7]

अभी तक आपने पढ़ा ,शैलेश जो कि एक चिकित्सक है ,अभी उन्तीस वर्ष का ही है ,उसके तीस वर्ष होने में ,अभी दो माह बाक़ी हैं किन्तु ज्योतिषाचार्य जी के कथनानुसार ,उसका विवाह तीस वर्ष से पहले हो जाना चाहिए। माँ कविता ,अपने बेटे के लिए लड़की ढूँढ रही है। उधर उसकी बहन भी कुछ परेशान है। शैलेश को ,एक बरसात की रात्रि में ,एक लड़की मिलती है और वो उस पर मुग्ध हो जाता है। अब आगे -


अक़्सर अपने क्लिनिक से ,शैलेश माँ के कहे अनुसार,शाम के  छह बजे तक ,अपने घर के लिए वापस हो जाता है किन्तु आज वो ,अपने सहायक के कहने पर भी ,नहीं जाता और सात बजते ही ,वो अपने घर के लिए निकल पड़ता है। सोहम उसका इस तरह का अज़ीब व्यवहार देखकर ,थोड़ा विस्मित तो होता है किन्तु वो कुछ नहीं कहता। गाड़ी में बैठा ,शैलेश मन ही मन उस रूप और यौवन का रसपान कर रहा था। स्मृति में ही उसे , इतना मधुर आनंद ,प्राप्त होता है कि वो मन ही मन मुस्कुराने लगता है। 

वो गाड़ी से बाहर की तरफ देखता है ,शायद उसे कहीं रूहाना दिख जाये ,वो गाड़ी चला तो रहा था ,किन्तु उसका मन तो दीदार ए  यार......  के लिए तड़प रहा था। उसे एक उम्मीद थी- कि वो शायद यहीं कहीं  दिख जाये किन्तु वो दिखाई नहीं दी। वो हैरान -परेशान, निराश सा आगे बढ़ रहा था। बहुत देर तक वो कहीं नहीं    दिखी। इसी कारण ,उसने अपनी गाड़ी की गति भी धीमी की हुई थी। नाउम्मीदी लिए, वो आगे बढ़ रहा था। जीवन में पहली बार तो उसने कोई हसीन स्वप्न देखा था ,वो भी समय से पहले ही टूटता नजर आ रहा था। अब तो सड़क पर भी ,अँधेरा हो गया, और उसी जंगल के करीब से वो जा रहा था। अब तो उसने उससे मिलने की उम्मीद ही छोड़ दी थी। तभी उसे ,उसी स्थान पर ,जहाँ पहले दिन उनकी मुलाक़ात हुई थी ,कोई साया नजर आया। 

शैलेश की इच्छाओं ने उड़ान भरी और वो तुरंत ही ,उस साये के नज़दीक था। उसकी इच्छानुरूप रूहाना ही वहाँ खड़ी थी। आज भी वो दूधिया वस्त्र पहने थी ,किन्तु आज भीगी हुई नहीं थी। उसकी मुस्कुराहट देखते ही ,वो खिल गया। झट से बोला -लिफ़्ट !

वो मुस्कुराते हुए बोली -लगता है ,आप मेरी ही प्रतीक्षा में थे। 

उसकी बात सुनकर ,वो अपनी जल्दबाज़ी पर झेंप गया और बोला -ऐसी तो कोई बात नहीं ,तभी संभलकर बोला -शायद आप भी मेरी ही प्रतीक्षा कर रही थीं। 

उम्मीद के विरुद्ध उसने जबाब दिया ,सही समझे ,दिल ही दिल में ,शैलेश तो जैसे प्रसन्नता से पागल हुआ जा रहा था , कहकर  वो बोली -शायद..... मेरा पर्स आपकी गाड़ी में रह गया, कहकर वो गाड़ी के अंदर आई और पर्स उठा लिया। शैलेश को बहुत आश्चर्य हुआ ,मैंने तो इससे पहले यहाँ कुछ भी नहीं देखा ,ये अचानक यहाँ कैसे ?सुबह भी नहीं था। उसने अपने दिमाग पर ज्यादा जोर नहीं डाला ,और सोचा जो भी हुआ ,अच्छा ही हुआ ,कम से कम हम मिल तो गये ,उसने तो जैसे ,उम्मीद ही छोड़ दी थी। 

उसका दिल कर रहा था - कि वो दोनों यूँ ही साथ बैठे ,बतियाते रहें और ये रात कभी न समाप्त हो। उसके पर्स लेते ही ,शैलेश बोला -आज भी छोड़ दूँ। 

ऑफ़कोर्स !कहकर वो उसके साथ ,आगे वाली सीट पर ही बैठ गयी। 

तब शैलेश ने उससे अपने दिल की बात कही और बोला -मैं तो रास्ते में ,आपको ही देखता आ रहा था कि कहीं , आपको मेरी सहायता की आवश्यकता तो नहीं।

वो मुस्कुराई ,शैलेश को तो पता नहीं ,क्या होता जा रहा था ?वो तो उसके ,रूप में खो जाना चाहता था। किस तरह और कैसे उससे कहे ?कि वो चाहता है ,कि प्रतिदिन ही वो उसे अपनी गाड़ी में बैठाना चाहता है।तभी वो बोला -मैं तो प्रतिदिन ही इधर से निकलता हूँ ,आप चाहें ,तो.... 

उसने शैलेश की तरफ देखा ,उसकी आँखें जैसे कह रही थीं ,हाँ ,मैं तुम्हारे संग जाने के लिए तैयार हूँ।प्रत्यक्ष बोला -मैं आपको छोड़ सकता हूँ। 


उसकी आँखों में अजीब सा आकर्षण था ,उसने हाँ में गर्दन हिलाई और बोली -मुझे  अब यहीं छोड़  दीजिये ,कहकर मुस्कुराई। उसके इतना कहते ही ,शैलेश का दिल तो ,जैसे  बैठ गया ,फिर वो अपनी गाड़ी से उतरा और गाड़ी के दूसरी तरफ जाकर दरवाजा खोला ,जब वो उतरी ,उसे एक ठंडक का एहसास मिला। 

शैलेश रूहाना  के बेहद करीब था ,उसकी सांसे ,रूहाना के  बदन से टकराई ,रूहाना की सांसों में अजीब सी अनुभूति होने लगी और उसे कुछ बेचैनी भी होने लगी। उसके पश्चात ,वो रुकी नहीं ,तेज़ी से बिना कुछ कहे निकल गयी। इस तरह का रूहाना का व्यवहार शैलेश को अजीब लगा। आज शैलेश ने ,अपनी गाड़ी की रौशनी में उस स्थान के  ,एक पेड़ पर एक निशान लगा दिया ताकि वो दिन में उसे देखकर समझ सके कि रूहाना  कहाँ उतरी  थी ?वह उसके विषय में ,अधिक से अधिक जानकारी प्राप्त करना चाहता था। 

उधर नंदिता ,अपने घर में बैठी रो रही थी ,और उस दिन को कोस रही रही थी ,जब वो उस ''ब्यूटी पॉर्लर ''में गयी थी। उसकी सहेली ने बताया था -बड़ा ही महंगा ''पॉर्लर ''है ,इसमें मालिश बहुत अच्छी होती है। उसने भी तो यही सोचा था -क्यों न महंगे ''पॉर्लर ''का आनंद लिया जाये और वो वहां पहुँच गयी अपनी उसी सहेली के संग। जब वो मालिश के लिए ,तैयार हुईं ,उन्हें उल्टा लिटा दिया गया। 

जब उसने अपने बदन पर ,किसी का स्पर्श महसूस किया ,तो उसे अच्छा लगा ,एक झलक उसने ,उसे देखना चाहा ,जो उसकी मालिश कर रही थी। वो कोई चीनी लड़की थी ,उसकी तरफ देख मुस्कुराई। नंदिता आश्वस्त होकर लेट गयी। 

ऐसा नंदिता के साथ उस पार्लर में क्या हुआ ?जिसके कारण उसे खून के घूंट पीने पड़ रहे हैं। क्या अगले दिन शैलेश को अपना लगाया निशान मिला ,क्या वो फिर से ,रूहाना से मिला जानने के लिए पढ़िए -बरसात की वो रात।  


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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