Barsat ki wo raat [ part 17]

अभी तक आपने पढ़ा -शैलेश रुहाना से मिलना चाहता है किन्तु उसकी बहन ,अपने भाई की सुरक्षा के लिए ,उसकी गाड़ी में और कमरे की खिड़की में लहसुन की माला लटका देती है ,जिसकी महक रुहाना को पसंद नहीं आती। तब शैलेश स्वयं ही ,उस माला को गाड़ी से निकालकर  फ़ेंक देता है। यह देखकर ,रुहाना का प्रेमी चाहता है कि उसकी गर्दन में अपने दाँत गड़ा दे और उसका रक़्त पी  जाये किन्तु वो ये भी जानता है -रुहाना उसे ऐसा नहीं करने देगी। रुहाना और शैलेश गाड़ी के अंदर हैं।


 तब रुहाना उससे पूछती है -तुम जानते हो ,ये तुम्हारी बहन ने तुम्हारी सुरक्षा के लिए ही रखी थी फिर भी तुमने मेरे लिए ,इसे फ़ेंक दिया। क्या तुम्हें  मालूम है ?मैं कौन हूँ ?मुझ पर इतना विश्वास !!

जहाँ प्रेम होता है ,वहां अविश्वास का प्रश्न ही नहीं उठता ,शैलेश ने सीधे -सीधे जबाब दिया। वैसे मैं एक डाक्टर हूँ ,कुछ तो समझ ही गया हूँ किन्तु फिर भी मैं ,तुम्हारे मुँह से तुम्हारी सच्चाई जानना चाहता हूँ। 

 क्या आप मुझे पहचान गए ?रुहाना ने पूछा। 

हाँ ,जब नंदिनी माँ से बता रही थी ,तब मैंने भी उसकी बातें सुनी ,तब मुझे उसकी बातों पर विश्वास नहीं हुआ किन्तु अब तुम्हें ,इनकी गंध से [लहसुन की माला की ओर इशारा करते हुए ]बचते देखकर समझ गया। मेरी प्रेमिका एक 'वैम्पायर ''है और वो मेरा लहू पीना चाहती है ,कहकर शैलेश  मुस्कुराया। तुम अब भी मुझे इसी तरह चाहते रहोगे।

तुम्हारे लिए तो जान भी हाजिर है ,तुम चाहो तो ,अब भी मेरा खून पी सकती हो कहकर उसने अपनी गर्दन कॉलर से बाहर निकाली ,उसके खून की गर्मी ,रुहाना को विचलित तो कर रही थी। तभी वो गाड़ी से  बाहर आ गयी।  बाहर लटका मैक भी ये सब देख सुन रहा था और वो गुस्से से उड़कर चला गया। तभी उसके चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान आई और वो कुछ सोचने लगा। 

शैलेश ने कहा -अब मैं ,तुमसे ही शादी करूंगा ,आज मैं घर जाकर सभी बातें साफ -साफ कह दूंगा।

रुहाना भी खुश हो गयी। जब घर आई तब उसने ,अपनी माँ को ये सभी बातें बतायीं ,उसकी बातें सुनकर माँ चिंतित हो गयी और अपनी  चिंता  रुहाना से व्यक्त की।

 तुम तो बिना रक्त के जीवित भी नहीं रह सकतीं ,और विवाह के पश्चात ,इंसानों के बीच कैसे रह पाओगी ?अभी तो वो मेरे सम्मोहन में था ,जब उसका सम्मोहन टूटेगा तब न जाने कैसा व्यवहार करेगा ?किसी इंसान से विवाह करना इतना आसान नहीं। 

मैं उसकी तरह तो नहीं बन सकती किन्तु वो तो मेरी तरह बन सकता है ,मैं उसे भी अपनी तरह ही बना दूंगी ,रुहाना ने अपनी माँ को जबाब दिया किन्तु माँ ये आपने क्या किया ?जो होना था -आज ही हो जाता ,सम्मोहन में करके आपने उसे ही नहीं ,मुझे भी ,धोखे में रहने पर मज़बूर कर दिया।यदि उसका सम्मोहन टूट गया ,तब वो मुझे पहचानेगा भी नहीं ,उसे ये सब सपने जैसा लगेगा।  

घर पहुंचकर आज ,शैलेश सब कुछ बताने वाला था। आज वो अपने घरवालों से रुहाना और अपने विवाह की बात करने वाला था। जब वो घर पहुँचा ,माँ ने ख़ुशी -ख़ुशी खाना दिया और बोली -अब समय से सो जा कल ,लड़कीवाले सगाई की रस्म के लिए आ रहे हैं। 

माँ ,मुझे आपसे एक बात करनी है। 

कहो ! क्या कहना चाहते हो ?

पहले आप इधर आकर ,मेरे पास तो बैठिये !

नहीं ,अभी बहुत काम निपटाना है ,जो भी कहना है ,कह दो !वरना   अभी सो जाओ !कल आराम से बातें करेंगे। रुहाना की माँ ,लगातार शैलेश के संग ,''मानसिक सम्पर्क  ''बनाये थी ,ताकि उसको पता चलता रहे। शैलेश ने अपने घरवालों से बात की कि नहीं।शैलेश अपने कपड़े बदलकर ,सोने चल दिया और उसे लेटते ही नींद आ गयी। ये भी ,रुहाना की माँ के कारण ही हो रहा था क्योंकि उसी ने , उसे स्मरण दिलवाने के लिए सुला दिया ताकि उससे अपनी बात करने के लिए कह सके। 

कार्य समाप्त करने के पश्चात ,कविता अन्य तैयारियों में जुट गयी। तभी उसे स्मरण हुआ ,आज तो वो पंडितजी के पास गयी थी और नंदिनी से बोली - आज मैं पंडितजी के पास गयी थी , तेरे भाई के लिए ''रक्षा सूत्र  ''लाई थी । पंडित जी ने उसे अभिमंत्रित किया है। इसे अपने भाई को दे आ !या देख लेना सो गया हो तो स्वयं ही उसकी बाज़ू में पहनाकर आना। 


ठीक है ,कहकर नंदिनी चली गयी और भाई को सोते देखकर ,उसने भाई के हाथ में ही वो ''रक्षा सूत्र ''बांध दिया।वो ताबीज़ समझो या ''रक्षा सूत्र ''बांधते ही ,रुहाना की माँ का सम्पर्क उससे टूट गया जो उसे सपने में भी जगाने का प्रयत्न कर रही थी। वो समझ नहीं पाई ,ऐसी क्या बात हो गयी ?जो वो उसके मष्तिष्क को नियंत्रित नहीं कर पा रही है। न ही उसके विचार पढ़ और समझ पा रही है। उस ''रक्षा सूत्र '' के कारण ,जितनी भी नकारात्मक शक्तियां थीं ,वो उसके करीब नहीं आ पा रही थीं। ख़ैर किसी तरह रात बीती। 

आज माँ ने जल्दी आने का आदेश दिया था और वो घर जाना चाह रहा था किन्तु उसे लग रहा था -जैसे कोई अधूरा कार्य है ,जो उसे पूर्ण करना है लेकिन वो कौन सा कार्य है ?उसे स्मरण नहीं हो रहा था। 

रूहाना शैलेश की प्रतीक्षा करती रही किन्तु वो तो आज शीघ्र ही अपने घर के लिए निकल चुका था। उसकी माँ भी नहीं समझ पाई कि वो कैसे उसकी भावनाओं ,विचारों को पढ़ नहीं पा रही है ?


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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