कहीं उड़े ग़ुलाल ,कहीं बाँटी गयी मिठाई है।
कितने बलिदानों के पश्चात ,आज़ादी हमने पाई है ?
भारतमाता भी आज ,बेड़ियों को तोड़ मुस्काई है।
कहीं पर ख़ुशी ,तो कहीं ग़म की बदली छाई है।
अग्रेज तो गए ,विभाजन की, कि उन्होंने बुवाई है।
विभाजन में भी ,न जाने कितने मरे -कटे भाई हैं ?
तब कितनी मुश्किलों से ,ये आज़ादी हमने पाई है ?
न जाने कितनी बहनों ने ,अपनी इज्ज़त ,जान गँवाई है ?
कहीं ख़ुशी के ढ़ोल बजे ,कहीं किसी की ,दुनिया से रुसवाई है।
महत्व समझो !इस आजादी का ,ये आज़ादी यूँ ही नहीं पाई है।
