pede vala

वो छोटी सी बच्ची अक़्सर बाजार में घूमती दिखाई दे जाती ,थी भी बड़ी प्यारी। उसकी मम्मी बड़े जतन से उसे सजाती होगी, कभी माथे पर कटे बाल, कभी छोटी -छोटी दो चोटी, कभी गुलाबी फ्राक पहनकर आती कभी सफ़ेद  कपड़े  पहनती, अच्छी  लगती थी । मैंने सुनील से पूछा- कि वो प्यारी सी बच्ची किसकी है ?वो बोले -सामने ही कोई वर्माजी हैं उन्होंने दुकान खोली है उनकी बच्ची है। वो उन्हें खाना देने आती है। अच्छा, एक दिन मैं उसकी तरफ देख रही थी तो टाटा कर रही थी।  मैंने सोचा, कि क्या वो मुझे जानती है ?मैंने पास बुलाकर पूछा -बेटा क्या नाम है तुम्हारा ?बोली -बिन्नी। मैंने पूछा- कहाँ रहती हो ?पता है ,क्या बोली -घर में। मैंने पूछा -पढ़ती हो ?तो बोली -हाँ ,मम्मी पढाती  हैं। शायद अभी स्कूल में भी जाना शुरू नहीं किया। मुझे ताज्जुब है ,इसकी मम्मी इतनी छोटी को टिफिन लेकर भेज देती है। किसी दिन कोई छीनकर ले गया तो। छोडो ,तुम भी क्या बातें लेकर बैठ गयीं ?सुनील ने कहा। मैं अपने काम में लग गई लेकिन उसका मुस्कुराता चेहरा ,टाटा करते हुए मेरी आखों के सामने घूम रहा था। 
                 वो अक्सर अपने पापा को खाना देने आती, उसके पापा के पास जब भीड़ होती तो वहीं आस -पास खेल रही होती। मैंने एक दिन पूछा-  तुम्हारी मम्मी तुम्हें अकेले भेज देती हैं। वो बोली -हाँ, अब मैं बड़ी हो गयी हूँ ,न। छोटा भइया जो आ गया। मैंने मुँह बनाते हुए कहा -ओह !वो फिर खेलने में लग गई। तभी उसके पिता की आवाज़ आई -बिन्नी जाओ ,चाय वाले से दो चाय के लिए बोलना। सामने ही चाय वाले की दुकान थी,वो चाय के साथ हल्का -फुल्का नाश्ता भी रखता था। मैंने कुछ दिन बाद देखा ,बिन्नी चाय वाले की दुकान पर बैठी थी ,मैंने सोचा -शायद उसके पिता ने फिर से चाय के लिए बोला  हो।मैं अपने काम में लग गयी ,थोड़ी देर बाद मैंने देखा कि चाय वाले ने इधर -उधर देखा फिर उसे अंदर की तरफ ले गया ,मेरे कमरे की खिड़की उधर की तरफ ही खुलती थी ,मैं वहीं बैठकर चाय पीने लगी। थोड़ी देर बाद वो लड़की बाहर आई उसके हाथ में पेड़ा  था ,वो पेड़ा लेकर अपने पापा के पास आ गयी। शायद उन्होंने पूछा था -पेड़ा कहाँ से लाई ?वो इशारे से बता रही थी। 
              अगले दिन भी यही बात दोहराई गयी , दो -तीन दिन बीत जाने पर मुझे शक़  होने लगा कि ये दुकानदार इसे अंदर क्यों ले जाता है ?बाहर से भी तो दे सकता है। सारी मिठाइयाँ तो इसकी बाहर  तरफ रखी रहती हैं फिर ये बच्ची को अंदर क्यों ले जाता है ?मैं एक औरत  हूँ ,ग़लत नजरें ,ग़लत सोच शीघ्र ही पकड़ लेती हूँ। मुझे लगा  था कि कुछ सही नहीं है। एक दिन मैंने उस बच्ची को अपने पास बुलाया तो वो भाग गयी। अगले दिन मैं उसी के इंतजार में थी। मैंने पहले ही पेड़े मँगा कर रख लिए थे ,बच्ची जब टिफिन लेकर आई और अपने पापा की  दुकान से बाहर निकली ,मैंने उसे अपने पास बुलाया ,वो शायद पेड़ा ही लेने के लिए जा रही थी ,मैंने उसे रोककर पेड़ा दिखाया तो वो रुकी ,पेड़े की तरफ ललचाई नजरों से देखने लगी। मैंने कहा -आज उन अंकल ने मुझे पेड़े दिए हैं ,कहा है यदि वो बच्ची आये तो उसे दे देना। अच्छा ,पैसे पापा दे देंगे कहकर वो मेरे पास आ गयी। अब मैं समझी ,कि इसके पापा कह देते होंगे कि तुम पेड़ा ले आओ ,पैसे मैं दे दूँगा। बिन्नी ने एक पेड़ा  लिया ,बोली -अब क्या पकड़ूँ ?मैं कुछ समझी नहीं। उस बच्ची ने जो बताया मेरा शक़ यकीन में बदल गया। इतनी छोटी और मासूम बच्ची के साथ इतनी नीच हरकत ,तभी मैं सोचूँ ये इसे अंदर क्यों ले जाता है ?इंसान इतना गिर चुका है ,इससे इसे क्या मिलेगा ?इस आदमी को शर्म नहीं आई ऐसी हरक़त करते हुए। लड़कियों को नवरात्रों में पूजते है देवी के रूप में अन्य दिन क्या वो देवी नहीं रहती ?जो लड़की जननी  होती है ,बेटी व बहन होती है उसकी रक्षा कैसे हो ?कुछ दरिंदे तो उम्र भी नहीं देखते। बस अपने दिमाग की गंदगी इधर -उधर बिखेरनी है। 
              मुझे उसके पापा का हो रहा था कि जब उन्हें पता चलेगा कि पेड़े वाला ऐसी हरक़त करता है तो उनके विश्वास को कितनी ठेस लगेगी। वो तो चलते बाज़ार में इतनी हरक़त कर  गया यदि उसे मौका मिलता तो शायद इससे भी ज्यादा ,सोच कर मैं सिहर उठी। वो तो मेरी इंद्री ने मुझे चेताया ,तब जाकर मुझे उसकी हरकतों के बारे में पता चला। अब मैंने बिन्नी को उसके घर भेज दिया और उसके पापा को शाम को अपने घर बुलाया जब सुनील और उसके पापा आये तो सुनील ने उनसे बात की क्योंकि मैं सुनील को पहले ही सब कुछ बता चुकी थी। सुनील की बातें सुनकर पहले तो उन्हें यकीन नहीं हुआ ,फिर वो एकदम से सर पकड़कर बैठ गए। अचानक उन्हें क्रोध आया और उससे लड़ने चल दिए किन्तु सुनील ने उन्हें रोक दिया ,लड़ने से बात फैलेगी उसे समझाना होगा या रंगे हाथों पकड़ना होगा। अंत में तय हुआ कि उसे बुलाते हैं ,उसे बुलाया शायद वो समझ गया था कि उसका भेद खुल गया है। वो अपनी दुकान छोड़कर भाग गया। महीनों उसकी दुकान बंद रही। अब वो छोटी बच्ची बिन्नी भी नहीं दिखती जो उम्र उसकी खेलने कूदने की थी उस उम्र में उस पर बंधन लग गए ,वो शायद समय से पहले ही बड़ी हो गयी या समाज की  कुछ गंदगी के कारण उसका बचपन छिन गया। 



















  
laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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