घर में बैठकर सभी परिवारजन, टेलीविजन पर एक फ़िल्म देख रहे थे। उसमें एक लड़की अपनी सहेली के जन्मदिन पर उसके यहां पार्टी में जाती है और वहां पर उसे ,उसकी सहेली के कुछ लड़के दोस्त मिलते हैं। जिनसे तमन्ना की भी जान -पहचान कराती है। जब तमन्ना अपने घर वापस जा रही थी ,तब उन लड़कों ने, उससे साथ चलने के लिए कहा -चलो ! हम तुम्हें छोड़ देते हैं।
उस लड़की ने एक बार भी नहीं सोचा -कि ये चार लड़के हैं और वो अकेली ,थोड़ी देर की जान -पहचान के कारण वो उनके साथ जाने के लिए तैयार हो गयी। जबकि उनके व्यवहार से ही लग रहा था कि वो लड़के सही नहीं हैं।
उन लड़कों के साथ गाड़ी में बैठ जाती है , रास्ते में ही लड़के उससे बातचीत करते हुए ,उसे पानी पिलाते हैं और उस पानी में जो नशे की दवाई थी ,उससे उसकी हालत खराब होती है, हालांकि उन लड़कों के इरादे सही नहीं थे। वो उस लड़की को एकांत में ले जाकर उसके साथ अनाचार करते हैं। जब वह होश में आती है तब उसे एहसास होता है, कि उसके साथ क्या हुआ है ?
फ़िल्म का यह दृश्य देखकर, तमन्ना की मम्मी बोलीं - इस लड़की से किसने कहा था ? कि उनके साथ जाये ,इसे उनके साथ जाने की क्या आवश्यकता थी ? ऑटो से गयी थी ,ऑटो से ही वापस आ जाती।
हां ,मैंने देखा है ,किंतु यह भी तो देखा है कि वो उसके दोस्त नहीं थे ,उसकी सहेली के दोस्त थे। इसे, उनसे इतना घुलने -मिलने की क्या आवश्यकता थी ? उसे इस तरह किसी अनजान पर इतना शीघ्र विश्वास करने की क्या आवश्यकता थी ?अपनी सहेली के यहाँ ही तो उसकी जान -पहचान हुई थी। इससे ज्यादा कुछ नहीं था, फिर उसने उन पर इतनी शीघ्र ही विश्वास कैसे कर लिया ?
वो अकेली लड़की, उन पांच -छह लड़कों के साथ , जाने में कैसे सहज हो गई ? वो इनकार कर सकती थी उन्होंने उससे कोई जबरदस्ती तो नहीं की थी। औपचारिक तौर पर यदि पूछ भी लिया तो उसे नहीं जाना चाहिए था। उन्होंने एक बार ही कहा और वह चली गई। गलती इस लड़की की है, अधिकतर इस तरह के तर्क वितर्क घरों में होते रहते हैं।
तमन्ना भी यह बात जानती थी ,कि मम्मी उसी को सुनाते हुए ये बातें कह रहीं हैं ,उनका अप्रत्यक्ष रूप से उसे समझाने का तरीका है। यह बात भी सही है ,शैली जी भी ,अपनी बेटी के प्रति सजग रहतीं हैं और उसे किसी न किसी बहाने समझाने बहाना ढूंढती रहती हैं। जिस कारण कभी -कभी तमन्ना को झुंझलाहट होती ,वो समझ जाती है ,ये बातें उसे सुनाते हुए ही ,कही जा रहीं हैं।
यह तो स्वाभाविक है, विचारों में अंतराल आना लाज़मी है। तमन्ना भी, आज के समय की लड़की है और वह देखती है , किस तरह लड़कियां घूमती हैं ,फ़ैशन करतीं हैं। नौकरी करने जाती हैं ,उसकी भी एक तमन्ना थी कि मैं भी इसी तरह से घूमूं- फिरूं जिंदगी का भरपूर आनंद उठाऊं।
किंतु ऐसी फ़िल्में देखते हुए ,उसकी मम्मी अक्सर भड़क जाती थीं और तमन्ना पर भी अक्सर नजर रखती थीं। इसी बहाने उसे समझाती रहती थी, किससे मिलना है ,किससे नहीं मिलना है, कहां जाना है और कहां नहीं जाना है ?यह सब तमन्ना को बंधन लगता था।
उस फ़िल्म को देखकर, तमन्ना ने सोचा था , शायद मम्मी एक लड़की के दर्द को समझेँगी, किन्तु उसने देखा कि मम्मी तो और भी भड़क गईं और गलती उनके लिए लड़की की थी।
तब उसने अपनी मम्मी से कहा - कि उस लड़की को, नशे में भी एहसास था कि उसके साथ कुछ गलत हो रहा है , उनसे ''नहीं'' कहा था, मना किया था। क्या आपने सुना नहीं 'नो मीन्स नो ''मना करने का मतलब क्या होता है ? आपने क्या 'पिंक ''फ़िल्म नहीं देखी, जिसमें 'नहीं' का मतलब 'नहीं 'होता है।
हमने तो वो फ़िल्में भी देखी हैं ,जिनमें लड़की 'हंसी तो फंसी ',अगर वह 'ना' कह रही है ,तो उसकी 'ना' में भी 'हाँ 'है। अब हमें इसका क्या अर्थ लगाना चाहिए ,यहाँ पर लड़की मना कर रही है, तो क्या उसकी 'हाँ 'है ?उन कहानियों प्रेम दिखाया जाता था ,जो मन का प्रेम होता था ,तन का नहीं। ये सिर्फ फिल्मी बातें हैं ,किंतु असली जिंदगी ऐसी नहीं होती है। अगर तुम्हें अपने आपको सुरक्षित रखना है तो अपने आप में दृढ़ होना होगा और इस लड़की की गलती यह थी, कि वह उन लड़कों के लिए अनजान थी। वे लड़के, उसके लिए अनजान थे, तो फिर उनके साथ जाने का प्रश्न ही नहीं उठता ,उसकी सबसे बड़ी गलती यही थी।
ऐसे तो हम किसी पर विश्वास ही नहीं करेंगे।
विश्वास क्यों करना है ? विश्वास तो कभी-कभी अपने भी तोड़ देते हैं। क्या माता-पिता बेटियों को पढ़ने के लिए विश्वास पर नहीं भेजते हैं ,तो क्या बेटियां उनका विश्वास नहीं तोड़ देती हैं ? इस नायिका के माता-पिता ने उस पर विश्वास करके ही तो उसे भेजा था ? उसने क्या किया ? सहेली के यहां से सीधा उसे अपने घर नहीं आना चाहिए था।
ऐसा नहीं होता है, कई बार दोस्ती भी हो जाती है , लेकिन उसे क्या उनकी नियत का मालूम था।
तो क्या हुआ ? क्या वो उनके विषय में जानती थी ,कौन हैं , कहां से आए हैं ? जान भी गयी तो एक ही मुलाक़ात में इतना विश्वास कर लेना उचित था ?
और यदि तुम कहती हो, कि 'नहीं' का मतलब 'नहीं 'होता है ,तो माता-पिता भी तो 'नहीं' बोलते हैं कि इधर नहीं जाना है, उधर नहीं जाना है, ऐसा व्यवहार नहीं करना है ,हम भी तुमसे कहते रहते हैं ,समझाते हैं -बेटा ऐसा मत करो ! पूछकर जाओ ! उस 'नहीं 'का मतलब क्या होता है ? जरा तुम मुझे समझाओगी ? तुम्हें तो आता है। उस 'नो 'का क्या अर्थ हुआ ?या फिर वो फ़िल्म के अभिनेता ने कहा है इसीलिए उस 'नो 'अर्थ ही तुम समझती हो।
माता -पिता भी तो अपने बच्चे के भले के लिए ,उसे कोई भी गलत कदम उठाने से पहले 'नो 'कहते हैं फिर उस 'नो 'का मतलब 'नो 'क्यों नहीं होता ? अपनी ज़िद क्यों होती है ?वे सुनते क्यों नहीं ? उनकी बातों को समझते क्यों नहीं ? जब वह किसी चीज के लिए मना कर रहे हैं ,कि यह कार्य 'नहीं' करना है, 'नहीं 'का मतलब' नहीं' होना चाहिए' न' यह सभी के लिए लागू होता है।
तमन्ना माँ के तर्क का जबाब न दे सकी और चुप हो गयी।
