मोहिनी,जब हवेली में पहुंची ,तब उसके पिता ने ,उसे बताया - उसके पास अभी एक दरवाजा और खोलने के उत्तरदायित्व था, तब मोहिणी पूछती है -यह चाबी इतने वर्षों से आपके पास थी ,तब आपने मुझे पहले क्यों नहीं बताया ? तब उसके पिता ने बताया -मुझसे, किसी ने वादा लिया था।
आपसे किसने वादा लिया था ? क्या मृणाल ने ? मोहिनी के भीतर कुछ काँपा।
मृणाल—वह स्त्री है ,जिसे लेकर अब तक उसका पूरा अतीत सवालों में घिरा था। वह जीवित थी, वह कह चुकी थी-' कि उसने मोहिनी को छोड़ा नहीं था, बल्कि उससे अलग कर दिया गया था। लेकिन किसने किया और क्यों ? इस सवाल का जबाब उसे अभी नहीं मिला था।
क्या मृणाल ने ,आपको यह भी बताया था, कि इस कमरे में क्या है? मोहिनी ने पूछा।
“नहीं ,उसने सिर्फ इतना कहा था, कि यहाँ तुम्हारे बचपन की एक ऐसी निशानी रखी है, जिसे देखकर तुम्हें समझ आएगा, कि तुम्हें हवेली से दूर क्यों ले जाया गया था ?
भानु जो अब तक चुपचाप खड़ा था, आगे आया और बोला - 'तो फिर देर किस बात की है ? हमें वो कमरा अब खोल लेना चाहिए।”
मोहिनी ने उसकी ओर देखा ,भानु के चेहरे पर हमेशा की तरह कठोरता थी, लेकिन उसकी आँखों में आज एक अलग बेचैनी थी। वह मोहिनी को जवाब दिलाना चाहता था, पर शायद उसे इस बात का डर भी था कि उन जवाबों में, उनके अपने रिश्ते से जुड़ा कोई अप्रिय सच न निकल आए।
“अगर वहाँ ऐसा कुछ मिला, जो हमारे परिवार के किसी सदस्य को दोषी साबित करता हो? तो क्या होगा ?मोहिनी ने धीमे स्वर में पूछा।
भानु ने बिना देर किए उत्तर दिया, “तो हम उस सच का सामना करेंगे।”
“और अगर उस सच से हमारा रिश्ता बदल गया तो क्या होगा?”
इस बार भानु कुछ क्षण चुप रहा ,फिर उसने कहा -मोहिनी !, हमारा रिश्ता पहले ही ऐसे फैसलों की वजह से बना है, जिनमें तुम्हें अपनी बात कहने का पूरा अवसर नहीं मिला। मैं नहीं चाहता कि हम अपना भविष्य भी किसी दूसरे के झूठ के सहारे जिएँ। सच चाहे जो हो, उसे जानने का अधिकार तुम्हें है।”
मोहिनी ने, उसकी ओर देखा ,वह जानती थी, कि भानु के लिए यह कहना, उसके लिए आसान नहीं था। रूद्र के साथ उसके पुराने रिश्ते की सच्चाई अब सामने आ चुकी थी ,फिर भी भानु उसे अपने अतीत से मुँह मोड़ने के लिए नहीं कह रहा था।
“ठीक है,”मोहिनी ने कहा “आज यह दरवाज़ा खुलेगा।”
हवेली की पहली मंज़िल के आखिरी छोर पर एक लंबा गलियारा था। उसके अंत में लकड़ी का एक पुराना दरवाज़ा दिखाई देता था, जिसे वर्षों से बंद रखा गया था। मोहिनी को वहाँ पहुँचते ही, एक अजीब-सी बेचैनी महसूस हुई , समय जैसे ठहर सा गया ,उसके सामने वही दृश्य उभरने लगे - 'दीवार पर टँगी तीन बच्चों की तस्वीर अब भी वहीं थी। तस्वीर के शीशे पर धूल जमी थी, लेकिन उसमें दिखाई देने वाले चेहरों को देखकर मोहिनी के मन में कुछ धुँधली यादें उभरने लगीं।एक छोटा-सा आँगन , बच्चों की मिली -जुली हँसी की आवाज़ ,लाल फीता बाँधे एक बच्ची और कोई, जो उससे कह रहा था—“ तुम मुझे भूलना मत ! मोहिनी ने अपनी कनपटी पर हाथ रख लिया।
“क्या हुआ? भानु ने तुरंत पूछा।
“कुछ याद आया है,” उसने कहा, लेकिन पूरा नहीं, जैसे कोई मुझे इस कमरे में आने से रोक रहा था… या शायद मैं खुद यहाँ आने से डर रही थी।”
मोहिनी के पालक पिता ने चाबी आगे बढ़ाई।
“दरवाज़ा खोलो, बेटा !”
मोहिनी ने काँपते हाथों से ताले में चाबी डाली। पहले चाबी घूमी नहीं, उसने थोड़ा दबाव दिया। अंदर से धातु के पुराने हिस्सों के खिसकने की आवाज़ आई -क्लिक ! की आवाज के साथ ताला खुल गया।दरवाज़ा धकेलते ही, हवा का एक ठंडा झोंका बाहर आया। कमरे में बंद पुराने कागज़ , लकड़ी और नमी की मिली-जुली गंध थी।
भानु ने दीवार को टटोलकर एक स्विच दबाया, एक बल्ब टिमटिमाया और फिर जल उठा।
कमरा किसी बच्चे के रहने की जगह जैसा लग रहा था। एक छोटा पलंग, लकड़ी की अलमारी, खिलौनों का टूटा हुआ डिब्बा और दीवार पर हाथों से बनाए गए रंगीन फूल ,लेकिन सबसे विचित्र बात यह थी कि कमरे में तीन छोटे पलंग थे।
देखो !मोहिनी तीन बिस्तर हैं।
मोहिनी धीरे-धीरे आगे बढ़ी, उसने एक पलंग पर हाथ रखा, लकड़ी पर नाखून से कुछ अक्षर खोदे गए थे -M. दूसरे पलंग पर लिखा था—B. तीसरे पर केवल एक छोटा-सा फूल बना था, जिसके नीचे का अक्षर मिटा दिया गया था।
यह कमरा सिर्फ मेरा ही नहीं था,”मोहिनी ने फुसफुसाते हुए कहा।
भानु ने तीसरे पलंग के पास झुककर लकड़ी पर उँगली फेरी और उसने अंदाजा लगाया ,शायद यहाँ तीन बच्चे रहते थे।”
मोहिनी ने उसकी ओर देखा और पूछा -“क्या तुम्हें ,अपने बचपन की इस जगह के बारे में कुछ भी याद नहीं?”
भानु ने'' न ''में सिर हिला दिया। मुझे सिर्फ़ हवेली का मुख्य हिस्सा याद है। दादाजी का कमरा, बड़ा आँगन, पूजा का कमरा… लेकिन यह गलियारा और यह कमरा मेरी यादों में नहीं हैं। अगर मैं यहाँ आया भी था, तो बहुत छोटा रहा होऊँगा।”
मोहिनी ने, कमरे की दीवार पर लगे चित्रों को देखा। एक चित्र में दो बच्चे हाथ पकड़े खड़े थे। तीसरे बच्चे का चेहरा किसी धारदार चीज़ से खुरचकर मिटा दिया गया था। जिसने यह चेहरा मिटाया, “वह नहीं चाहता था कि हम इसे पहचानें ,मोहिनी बोली।
“या फिर वह चाहता था, कि हम कभी यह तस्वीर देखें ही नहीं,”भानु ने उत्तर दिया।
कमरे के कोने में रखी अलमारी के नीचे,एक छोटा-सा लोहे का बक्सा दिखाई दिया। उस पर भी वही तीन अक्षर खुदे थे—M.B.R.
भानु ने बक्सा उठाने की कोशिश की, लेकिन वह भारी था। मोहिनी ने उसकी सहायता की, दोनों ने मिलकर उसे मेज़ पर रखा ,चाबी ताले में लगाई गई।इस बार ताला आसानी से खुल गया ,अंदर कुछ पुरानी तस्वीरें, कपड़े का एक छोटा टुकड़ा, अस्पताल की रसीद और मोम से सीलबंद एक लिफाफा था।
मोहिनी ने सबसे पहले कपड़े का टुकड़ा उठाया ,वह लाल फीते का हिस्सा था।उसकी उँगलियाँ ठिठक गईं। यही फीता उस तस्वीर में था,” उसने कहा - “वही बच्ची… जिसकी कलाई पर लाल फीता बँधा था।”
भानु ने तस्वीर उठाकर ,कपड़े के टुकड़े के पास रखा, रंग और बुनावट एक जैसी थीं ,इसका मतलब है कि यह कमरा और अस्पताल के रिकॉर्ड आपस में जुड़े हैं,” उसने कहा।
मोहिनी ने लिफाफा उठाया, उस पर कोई नाम नहीं था, केवल एक पंक्ति लिखी थी—जब तीनों में से कोई एक लौट आए, तभी इसे खोलना ! नीचे तारीख थी—18 अगस्त 2001।
मोहिनी ने अपने पालक पिता की ओर देखा ,क्या आप जानते हैं , कि इस लिफाफे में क्या है?”
“नहीं,” उन्होंने कहा -मैंने इसे पहले कभी नहीं देखा।”
लेकिन चाबी आपको दी गई थी, क्या आपको यह नहीं बताया गया कि बक्सा भी इसी कमरे में है?
उन्होंने कुछ सोचकर उत्तर दिया, “मुझे सिर्फ कमरे तक पहुँचने का रास्ता बताया गया था,बक्से के बारे में किसी ने कुछ नहीं बताया।”
भानु ने, लिफाफे को ध्यान से देखा ,इसे खोलने से पहले हमें बाकी चीज़ें भी देखनी चाहिए। हो सकता है ,इनमें कोई ऐसा संकेत हो, जो पत्र को समझने में हमारी सहायता करे। मोहिनी ने सहमति में सिर हिलाया।
