उसने, कभी मेरी पसंद ,नापसंद पूछी ही नहीं।
तुम क्या चाहती हो ?मुझसे कभी जाना ही नहीं।
मेरे घुटते शब्दों को,मेरी सोच की तह खोली नहीं।
मेरी छटपटाहट,तमन्नाओं की तह तक पहुंचा नहीं ।
हताश हुई, कई बार, सीने से लगा,भरोसा दिया नहीं।
तन्हा रोती, उसके आलंबन की प्रतीक्षा में जीती रही।
प्रश्न उभरा , कैसा इंसान है ? जिसे मेरी 'परवाह नहीं।'
फ़ुरसत किसे ?बलहीनता की, क्या बालकों साथ नहीं ?
बेपरवाह इंसान को देख ,समझती रही उसकी मजबूरियां।
साथ रहकर भी मेरा नहीं, सोचा कई बार तोड़ दूँ,ये बेड़ियाँ।
दरख़्त बन ,अब उसमें ''आलंबन ''तलाशना छोड़ दिया।
बनी थी , मेरे इश्क़ में सहारा,अब तोड़ दीं, वो बैसाखियाँ।
