Parvah nahi

 उसने, कभी मेरी पसंद ,नापसंद पूछी ही नहीं। 

 तुम क्या चाहती हो ?मुझसे कभी जाना ही नहीं। 

मेरे घुटते शब्दों को,मेरी सोच की तह खोली नहीं।

मेरी छटपटाहट,तमन्नाओं की तह तक पहुंचा नहीं ।



 हताश हुई, कई बार, सीने से लगा,भरोसा दिया नहीं। 

तन्हा रोती, उसके आलंबन की प्रतीक्षा में जीती रही। 

 प्रश्न उभरा , कैसा इंसान है ? जिसे मेरी 'परवाह नहीं।' 

 फ़ुरसत किसे ?बलहीनता की, क्या बालकों साथ नहीं ?

 

बेपरवाह इंसान को देख ,समझती रही उसकी मजबूरियां। 

साथ रहकर भी मेरा नहीं, सोचा कई बार तोड़ दूँ,ये बेड़ियाँ। 

 दरख़्त बन ,अब उसमें ''आलंबन ''तलाशना छोड़ दिया। 

बनी थी , मेरे इश्क़ में सहारा,अब तोड़ दीं, वो बैसाखियाँ। 


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

Post a Comment (0)
Previous Post Next Post