नंदिनी बहुत देर तक अपने कमरे में ही रही ,नानी को लगा, अवश्य ही कुछ तो हुआ है ,वरना अब तक अपने कपड़े बदलकर नीचे आ जाती थी। आज इसे दीपक से बात करने के लिए कहा था ,किन्तु लगता है ,उसने मना कर दिया। यदि उसने मना भी कर दिया, तो क्या हुआ ?ये तो उससे प्यार करती ही नहीं है फिर क्यों परेशान है ?
नंदिनी अपने कमरे में पहुंची,न जाने क्यों ? उसका मन उदास है, वह सब जानती और समझती है। न ही उसने दीपक से कुछ कहा और न ही दीपक ने उससे कोई वायदा किया, फिर भी न जाने क्यों ?उसके दिल को ठेस पहुंची है। जैसे उसकी चीज किसी ने, उससे छीनने का प्रयास किया हो।
क्या कर रही है ? एक स्वर उसके कानों में गूंजा ,कांपता स्वर सुनकर नंदिनी ने पीछे मुड़कर देखा। उसने देखा - हांफते हुए, नानी उसी से पूछ रहीं थीं - क्या तूने अभी तक कपड़े नहीं बदले ? उसके कमरे के दरवाजे पर नानी खड़ी थी। नानी को देखकर नंदिनी को आश्चर्य हुआ ,और तेजी से उठकर उनके क़रीब आई और उनका हाथ थामा ,नानी ! आपसे तो ऊपर चढ़ा भी नहीं जाता, यहां कैसे आ गईं ? नानी को देखकर वह सब कुछ भूल कर नानी को पकड़कर सहारा देते हुए बोली - नानी ! आप यहां कैसे ? आपने मुझे आवाज क्यों नहीं लगाई ? मैं आ जाती।
तुझे आना ही था, तो अब तक आ जाती, इतनी देर से मैं ,तेरी प्रतीक्षा कर रही थी। क्या आज भोजन नहीं करना है ?
नहीं, नानी मुझे भूख नहीं है, उदास होते हुए ,नंदिनी ने कहा।
तुझे भूख नहीं है किंतु मुझे तो भूख है ,कम से कम मेरे लिए ही कुछ बना देती। जब से मैं ,तेरी प्रतीक्षा में थी, वैसे तो मैं ही कुछ अपने लिए बना लेती किंतु मैंने सोचा -''जब तू आ जाएगी तो नानी -धेवती दोनों साथ में भोजन करेंगे। अब तू तो यहां आकर बैठ गई और मैं नीचे तेरी प्रतीक्षा कर रही थी।
आपने, मुझे बुलाया क्यों नहीं ?नंदिनी प्यार से बोली।
बुलाती तो क्या तू इतनी जल्दी आ जाती ? तू अपनी उदासियों के घेरे में, घिरी हुई थी, क्या उसे तोड़ पाती ?
नंदिनी को लगा, जैसे नानी ने, उसके 'मन के चोर को 'पकड़ लिया है। तब वह बोली -नहीं, नानी ! ऐसी कोई बात नहीं है, बस आज जरा थोड़ा सा थक गई हूं।
क्या तू सच में ही थक गई है ? नानी ने ,उसके चेहरे पर नज़रें गड़ाते हुए पूछा। अब नीचे चलेगी या नहीं,या यहीं बातें बनाती रहेगी। अभी मैं कपड़े बदल कर आती हूं ,आप यहीं बैठी रहिए ! ऊपर आते हुए थक गई हैं देखो ! सांस कैसे उखड़ रही थी ? मैं आपका हाथ पकड़ कर ले चलूंगी ,कहते हुए नंदिनी फुर्ती से उठी और जल्दी-जल्दी उसने, अपने कपड़े बदले और नानी का हाथ पकड़ कर सीढ़ियों से नीचे उतरने लगी।
नीचे आकर नानी बोलीं -और काम बाद में करना पहले, खाना खा लेते हैं।
हां, नानी अभी लाई।
और साथ में अपने लिए भी ले आना, मुझे कहना ना पड़े।
नंदिनी मुस्कुराई और रसोई घर के तरफ चली गई कुछ देर में वह एक थाली में भोजन परोस कर ले आई। तब बोली -नानी, आपने तो सब कुछ बनाया हुआ है फिर मुझसे झूठ क्यों बोला ? कि आपको भूख लग रही है, भोजन तो बना हुआ रखा है।
झूठ कहाँ बोला ?भूख तो अभी लगी हुई है ,किन्तु मेरे अकेले खाने का दिल नहीं कर रहा था। अब तू साथ में है, तो तेरे साथ खाने की आदत पड़ गई है , तब से तेरी प्रतीक्षा ही तो कर रही थी किंतु तेरा आना ही नहीं हुआ भोजन करते हुए नानी ने कहा।
नानी !मैं सब समझती हूँ ,आप बहुत चालाक बन रही हो।
तेरी नानी हूँ , अच्छा यह बता ! क्या कुछ बात हुई है जो तू इतनी परेशान है।
नहीं, नानी ! ऐसी कोई बात नहीं है, मैं परेशान नहीं हूं।
अब तू, मुझसे भी बातें छुपाएगी, किंतु तेरा चेहरा तो कुछ और ही कह रहा है। इसलिए जो कुछ भी तेरे मन में है। सच-सच बता दे ! क्या तेरी दीपक से मुलाकात हुई थी ?
दीपक का नाम आते ही, नंदिनी फिर से उदास हो गई और हां में गर्दन हिलाई।
तब क्या हुआ ? उससे कुछ बात हुई ?
नहीं,
क्या तूने, उससे कोई बात ही नहीं की ?
नहीं, कर पाई, करना चाहती थी, किंतु नहीं कर पाई ,पूछना चाहती थी, किंतु नहीं पूछ पाई। सोचा। लौटते समय उससे पूछ लूंगी।
क्या तब पूछा ?
लौटते समय भी नहीं पूछ पाई।
तब तूने घर आने में इतनी देर भी क्यों लगा दी ?और उससे पूछा क्यों नहीं ?
आज मैं, उसके साथ नहीं आई हूं।
क्यों ,क्या कारण रहा, क्या वह आज तुझे लेने नहीं आया ?
लेने आ जाता तो फिर... शायद आज भी मैं इस भ्रम और धोखे में ही रहती।
कैसा भ्रम, कैसा धोखा ?
अब नानी, ये सब बातें छोड़ो ! इससे कोई लाभ नहीं है , शायद उन बातों को कहते हुए भी, उसे पीड़ा महसूस हो रही थी।
किंतु नानी आसानी से मानने वाली नहीं थी, तब उन्होंने पूछा -जब तक मुझे कुछ नहीं बताएगी, तब तक तुझे छोडूंगी नहीं ,समझी !
नानी !आप न... बहुत जिद्दी हो।
तो क्या तू कम है , बिल्कुल अपनी नानी पर गई है, कहते हुए नानी मुस्कुराई।
नानी की बातों से नंदिनी का मन थोड़ा शांत हुआ, तब नंदिनी बोली -आज ,उसने मुझे लेकर आने से इनकार कर दिया था ,तब मैंने सोचा-' पैदल ही चली जाती हूं।'
इतनी दूर से तुझे पैदल क्यों आना था ? क्या कोई रिक्शा वहां नहीं मिला ?
बस... न जाने क्यों ?मेरा मन नहीं किया, टहलते टहलते आ जाना चाहती थी। जब मैं रास्ते में आ रही थी तब मैंने दीपक को किसी के साथ देखा ?
नानी की आंखें आश्चर्य से फटी रह गई और पूछा -किसके साथ देखा ?
वो कोई महिला थी।
कौन थी ?वह औरत ! क्या तूने उससे पहले भी कहीं देखा है?
नहीं, मैंने आज से पहले उसे कभी नहीं देखा।
तो क्या वह शादीशुदा थी ? नानी ने अपनी तहकीकात आरंभ कर दी।
दूर से कुछ भी पता नहीं चल पा रहा था, उसने सूट पहना हुआ था और दीपक के साथ बगीचे में अंदर चली गई।
तू किस बगीचे की बात कर रही है ?
वही जो चौराहे पर कोने में एक बगीचा है।
क्या तूने देखा, वह सच में ही दीपक था ? या फिर तेरी कोई गलतफहमी थी।
नहीं, नानी !इतनी बड़ी गलतफहमी नहीं हो सकती ,वह सच में ही दीपक ही था।
उनके व्यवहार से उनकी बातचीत से तुझे कैसा लगा ? उनका रिश्ता कैसा हो सकता है ?
अब मैं क्या बताऊं? नानी के प्रश्नों से नंदिनी झल्लाने लगी और बोली -मुझे क्या मालूम ,उनका आपस में कैसा रिश्ता है ?
उनकी कैसी हरक़तें थीं ? नानी के इस प्रश्न पर नंदिनी ने उन्हें घूरकर देखा। इस तरह क्यों घूर रही है ?मेरे प्रश्नों के सही जबाब देगी तभी तो मैं ये केस सॉल्व कर पाऊँगी ,कहकर मुस्कुराईं।
