नंदिनी आज दीपक से बात करके नानी के कथनानुसार ,उसकी विचारधारा जानना चाहती है ,उसके मन में नंदिनी के लिए क्या सोच है ?किन्तु आज छुट्टी हो जाने के कारण जा नहीं पाई ,तब नंदिनी ने सोचा -'चलो ,आज के दिन दूर से ही मुलाकात हो जाये ,जैसे वो हर बार की छुट्टी में ऐसा ही करती है। किन्तु नंदिनी ने देखा ,दीपक तो बाहर जा रहा है। उसने ,नंदिनी से फोन पर कह दिया -'मैं किसी कार्य में व्यस्त हूँ , नंदिनी को बड़ा अजीब लगा ,ये बाहर गया है और मुझसे इसने इतना बड़ा झूठ क्यों बोला ?इसकी ऐसी क्या मजबूरी हो सकती है ?यदि सच बता भी देता तो क्या मैं उसे बाहर जाने से रोकती ?
तब सोचा, मैं व्यर्थ में ही परेशान हो रही हूँ , इसका कोई अपना व्यक्तिगत कार्य भी हो सकता है। यह सोचकर उसने, अपना ध्यान दीपक से हटाया और अपने घर के कार्यों में व्यस्त होने का प्रयास किया।
नानी ,ये सब देख रही थी ,तब उन्होंने, नंदिनी से पूछा -तुम इस तरह बेचैन क्यों हो ,क्या कोई परेशानी है ?
नहीं, नानी कोई परेशानी नहीं है ,मैं तो ये सोच रही थी ,मुझे आज ये याद क्यों नहीं रहा? कि आज छुट्टी थी ?बात को बदलने का प्रयास करते हुए नंदिनी बोली।
नानी मुस्कुराई और बोलीं -जब हमारे विचार हमारी सोच एक ही जगह अटककर रह जाती हैं ,तब ये चीजें आँखों के सामने होते हुए भी विस्मृत हो जाती हैं।
क्या कह रही हो ?नानी ! ऐसा कुछ भी नहीं है। भला मेरा ध्यान कहाँ अटका होगा ?
वैसे तो ये बात मुझे कहने की आवश्यकता नहीं है ,फिर भी तुम्हें बताती हूँ। जब तुम्हें अपने बेटे नितिन की फ़िक्र थी। तब सारा दिन उसी के अच्छे -बुरे के विषय में सोचती रहती थी।
वो तो अब भी है।
हाँ ,मैं कब मना कर रही हूँ ? किन्तु उससे ज़्यादा अब दूसरी सोच तुम पर हावी हो चुकी है। किसी के लिए सोचना ,उसके विषय में जानना, कोई बुरी बात नहीं है। यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है किन्तु जब हम किसी से प्रेम करने लगते हैं। तब उसके विषय में अनायास ही विचार आने लगते हैं। उसके विषय में हम जानना चाहते हैं। उसके प्रति चिंतित होना भी एक प्रक्रिया है। भला सोचो !एक लड़का जो हमारे घर से तीन -चार घर की दूरी पर रहता है। हम उससे मिलना चाहते हैं। उसकी एक झलक को आतुर हो उठते हैं ,ऐसा क्यों ?नानी ने, नंदिनी के चेहरे को मुस्कुराते हुए देखा।
नंदिनी ने पूछा - नानी ! आप ये सब कैसे समझती हैं ?
क्यों ? क्या कभी मैं जवान नहीं थी ? तुमसे ज्यादा मैंने ज़िंदगी जी है ,लोगों को देखा ,परखा और ज़िंदगी को महसूस किया है।
तभी नंदिनी को बाहर मोटरसाइकिल की आवाज सुनाई दी ,ये उसी की गाड़ी की आवाज है ,वह समझ गई कि दीपक अब घर वापस आ चुका है। उसने घड़ी में समय देखा। मन ही मन उसने सोचा अगर उसे, मुझे बताना होगा तो स्वयं ही बताएगा। मैं उससे पूछूंगी नहीं। यह उसने अपने मन को समझाने के लिए कहा अंदर ही अंदर वह चाहती थी, कि पता तो चले, वह इतनी सुबह-सुबह कहां गया था ?
दिन भर दीपक ने न ही नंदिनी को फोन किया ,न ही उससे मिला अगले दिन वह तैयार हुआ और उसकी प्रतीक्षा करने लगा। नंदिनी घर से बाहर आई ,उसने दीपक का चेहरा देखा और उससे पूछा -क्या रात भर सोए नहीं थे ? अगर कोई परेशानी है तो तुम, मुझे बता सकते हो। अपने दोस्तों से ही तो बातें शेयर की जाती हैं, मुस्कुराते हुए नंदिनी ने कहा
नहीं तो, ऐसी कोई बात नहीं है, दीपक ने पूछा - क्यों, तुम्हें ऐसा क्यों लग रहा है ?
तुम्हारे चेहरे से लग रहा है,, नंदिनी ने कहा।
अच्छा तुम चेहरा भी पढ़ लेती हो, कहकर उसने मुस्कुराने का प्रयास किया और उसने रास्ते में नंदिनी से कोई बात नहीं की ,जबकि नंदिनी चाहती थी कि वो उससे कुछ कहे ,चाहकर भी वो उससे कुछ पूछ न सकी।
जब नंदिनी अपनी मंज़िल तक पहुंची ,तब दीपक में बोला -मैं आज शाम को तुम्हें लेने नहीं आ पाऊंगा,मेरी प्रतीक्षा मत करना।
क्यों ,क्या हुआ ,आज कुछ बात है?
हां ,किसी से मिलना है, उसने संक्षिप्त सा जवाब दिया और आगे बढ़ गया।
नंदिनी को लगा ,अवश्य ही दीपक मुझसे कुछ छुपा रहा है। यदि उसे बताना होता तो बता सकता था। किन्तु नंदिनी के मन में अनेक प्रश्न छोड़ गया। अपने प्रश्नों के जवाब ढूंढने के लिए का प्रयास करती रही। तब उसे लगा ,शायद हमारी दोस्ती ही है ,वो भी इतनी गहरी नहीं जो वो मुझे कुछ बता सके। अचानक ही उसके व्यवहार में ऐसा बदलाव क्यों आया है ? जबकि अब मैंने इस रिश्ते में आगे बढ़ने का सोचा है।
शाम के समय आते हुए ,नंदिनी पैदल ही धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी। उसका मन ही नहीं किया कि वह ऑटो कर ले, जबकि वह जानती है कि ऑटो से वह दस -पंद्रह मिनट में घर पहुंच जाएगी किन्तु घर पहुंचने की जल्दी ही किसे है ?
उसे इस तरह टहलते हुए जाना अच्छा लग रहा था। वह स्वयं भी नहीं समझ पा रही थी ,वह ऐसा क्यों कर रही है ? जब वह सड़क पार कर रही थी ,तब सड़क के दूसरे कोने पर एक बगीचा उसे दिखलाई दिया। आते -जाते हर बार वो बगीचा उसे दिखलाई पड़ता है किन्तु आज.... बगीचे में उसने दीपक को किसी स्त्री के साथ जाते हुए देखा। पहले तो उसे, अपनी आंखों पर विश्वास ही नहीं हुआ और सोच रही थी कोई और ही होगा। किंतु मन में बेचैनियां बढ़ने लगी और वह सोचने लगी-' अब मुझे पता लगाना ही होगा कि वह ऐसा क्यों कर रहा है और यह महिला कौन है ?कहीं मैं दोबारा जिंदगी में 'धोखा' तो नहीं खाने वाली हूं।
ऐसा विचार आते ही, उसने अपनी राह उस बगीचे की तरफ मोड़ दी, उसने छुपकर देखा, दीपक एक बेंच पर बैठकर उस अनजान महिला से बातें कर रहा है। अनजान तो वो नंदिनी के लिए है ,हो सकता है दीपक उसे जानता हो।
यह कौन हो सकती है ? यदि इसकी मां होती , नहीं माँ भी नहीं हो सकती ,वो घर पर ही आ सकती थी। हो सकता है ,इसकी कोई बहन हो ! ऐसा सोचकर क्या मैं अपने मन को ही समझा रही हूं। मैंने कभी उसके परिवार की कोई भी तस्वीर भी नहीं देखी। मैं कैसी एक अंधी गली में चल रही थी। अब मन ही मन उसे पश्चाताप हो रहा था कि उसके विषय में कुछ जाने बगैर ही मैंने उससे अपने संबंध बना लिए। उसका दिल किया कि यहीं बैठ जाए ,अब उसके कदमों में जैसे जान ही नहीं रही , क्या करें ?
तब वो धीरे से उठी, आगे बढ़ने लगी ,मन में ख्याल आते गए ,उतने ही उसके क़दम भारी होते गए उसे घर पहुंचने में, कम से कम आधा पौना घंटा लग गया।
उसको इस तरह देरी से आया हुआ देखकर , नानी ने पूछा - आज इतनी देरी से कैसे आना हुआ किंतु नंदिनी कुछ भी जवाब दिए बगैर अंदर आ गई और नानी चुपचाप उसे जाते हुए देखने लगी और सोच रही थी, कल मैंने इस पर दबाव बनाया था कि वह दीपक से स्पष्ट बात कर ले, किंतु लगता है, बात नहीं बनी।
