जब राहुल ने सुमति को बताया -मम्मी, पंद्रह दिनों के लिए 'तीर्थ 'के लिए गयीं हैं ,तो यह सुनकर सुमति का दिमाग चकरा गया, और क्रोध भी आया तब बोली- तुम्हारी मम्मी को, इस उम्र में घूमने की क्या जरूरत पड़ गई, क्या उनसे घर में टिककर रहा नहीं जाता ? अब सुबह को मुझसे, जल्दी नहीं उठ जाएगा, कामवाली भी बाद में आएगी। शायद ,आज भी पोछा नहीं लगा।
यह गृहस्थी हमारी और तुम्हारी है, मम्मी की नहीं ,मम्मी ने हमें पाल-पोसकर बड़ा कर दिया। इस लायक बना दिया कि हम, खुद करके कमा खा सकें। कम से कम इतना शुक्र तो मनाओ ! हमारे छोटे बच्चे को भी उन्होंने पाल दिया। राहुल ने उसके चेहरे की तरफ देखा,सुमति के चेहरे पर परेशानी स्पष्ट नज़र आ रही थी।
तब वो आगे बोला -बेचारी ! जब जाने की उम्र थी , तब हमारे कारण कहीं घूमने नहीं जाती थीं। अब तुमको देखना है, कि तुम्हें इस घर को कैसे मैनेज करना है ?
सुमति को गुस्सा तो बहुत आ रहा था ,पर क्या करें ? कुछ कह नहीं सकती थी। जो कुछ भी राहुल ने कहा ,सही है।
अगले दिन सुबह जल्दी से अलार्म की आवाज पर उठी ,नाश्ता बनाया और जल्दी-जल्दी काम करके बाहर आई, किंतु अब सारी रसोई फिर से बेतरतीब हो गई थी, बेटे के भी कपड़ों पर प्रेस नहीं थी। राहुल ने,बेटे को उठाकर तैयार किया। कुछ भी समझ नहीं आ रहा था,' कहां से शुरू करें और कहां पर खत्म '' समय था कि दौड़ता जा रहा था। सुमति मन ही मन सोच रही थी - इस बुढ़िया को भी न जाने अब इस उम्र में क्या घूमने की सूझी है ? राहुल से कहूंगी ,तो समझेगा भी नहीं। जल्दी से तैयार होकर किसी तरह से ऑफिस के लिए भागी।
आज उसके चेहरे पर थकान और परेशानी स्पष्ट नजर आ रही थी ,उसके दफ्तर में भी, उसके सहयोगियों ने पूछा -क्या कोई परेशानी है ?
नहीं, ऐसी तो कोई बात नहीं है, कह कर उसने बात को टालना चाहा।
पड़ोसन को चाबी देकर गई थी कि काम वाली आये ,तो पोछा -झाड़ू करके तो चली जाएगी। दिनभर यही चिंता सताती रही ,अभी तक तो निश्चिन्त रही थी ,मम्मी सब संभाल लेंगी। कामवाली ज्यादा पुरानी भी नहीं है ,अकेला घर देखकर कहीं कुछ हटा न ले। शाम को जब घर आई ,कपड़े इसी तरह से बिखरे हुए थे।
सुमति को क्रोध आया ,मैं इस कामवाली का क्या करूं ? एक भी सामान संभाल कर नहीं रखा, सुमति बड़बड़ा रही थी।
अगले दिन उसने काम वाली को फोन पर कहा -कम से कम थोड़ा बहुत सामान तो संभाल सकती थी ,क्या इतना काम भी तुमसे नहीं होता ,तुम्हारे पोंछा लगाने का क्या लाभ ?
नहीं ,दीदी जी , यह मेरा काम नहीं है, मेरा काम झाड़ू -पोछा लगाना है ,ये काम तो आपकी सास करती रहती थीं। मैंने पहले भी ये काम नहीं किया।
मम्मी ने ही, तुम्हारी आदत खराब की है।
आदत खराब नहीं ,मैंने उनसे भी ,पहले ही कह दिया था ,ये मेरा काम नहीं है ,बस...यदि सामान संभालवाना है तो इसके पैसे अलग से लगेंगे। उसने अलग से हजार रुपए बता दिए।
सुमति चुप हो गई ,आगे कुछ कहने का साहस ही नहीं रहा, मन ही मन बुदबुदाई ,''बुढ़िया कम से कम, यह सामान तो संभाल ही लेती थी। मेरे हजार रुपए बच रहे थे।''
सुमति का बेटा स्कूल से आकर पड़ोस में खेलता रहता है ,एक दिन उसके चोट लग गई। उसे ऑफिस से जल्दी आना पड़ा। भूखा बच्चा, पड़ोसी के बच्चे के साथ खेल रहा था ,कब तक खेलता ? थका हुआ था शायद, सीढ़ियों पर बैठे -बैठे सो गया और नींद में सीढ़ियों से नीचे गिर पड़ा।
पड़ोसन को भी तो ,कुछ नहीं कह सकती थी। परेशानी में ऐसे ही ,बैठी हुई थी ,तब वह सोच रही थी अचानक मेरी सास को न जाने क्या हुआ ? जो घूमने चली गईं।
शाम को उसने राहुल से कहा -ऐसा कब तक चलेगा ? तुम्हारी माँ को नजर नहीं आता ,इतना छोटा बच्चा अकेला कैसे रहेगा ?आज उसे चोट लगी है ,कल को कुछ और ज़्यादा घटित हो सकता था। अब मैं नौकरी करूं ,घर देखूं या फिर बच्चा सम्भालूं।
यहां किसी से पूछ लो ,जब तक हम आते हैं ,वो बच्चे को संभाल लें ,जो पैसा बनेगा, दे देंगे।
तुमने ये ठीक कहा ,मैं किसी से पूछकर देखती हूँ। अगले दिन सुमति का उदास चेहरा देखकर ,राहुल ने पूछा -क्या तुमने किसी से पूछा ?
हाँ ,वो कह रही थी -किसी के बच्चे को रखना ,बहुत बड़ी जिम्मेदारी है ,यदि बच्चे को गृहकार्य भी कराएगी तो दस हजार रूपये लगेंगे। बस उसका ख़्याल रखना है तो आठ हज़ार....महंगाई की तो मार पड़ी है। हर जगह महंगाई। यदि इसको ,उनके पास छोड़ा तो हम इतनी सेविंग्स नहीं कर पाएंगे। बच्चे की आगे की पढ़ाई है। घर भी बनवाना है।
मम्मी का जो खर्चा होता था ,अब वो तो बच रहा है ,राहुल ने कहा।
उनका ऐसा खर्चा ही क्या था ? दवाई और दो रोटी सुमति बोली।
क्यों ?उस दिन तो तुम कह रहीं थीं ,मम्मी जी के खर्चे बहुत हैं। अब धीरे -धीरे सुमति को एहसास होने लगा था। मम्मी जी घर के कितने काम संभालती थीं ?जिनको मैं समझ ही नहीं पाई। मैं भी न जाने क्यों ,उनसे चिढ़ी रहती थी ? उन्होंने तो कभी मुझसे कुछ कहा भी नहीं ,बल्कि उनके कुछ कहने पर वही करती जिसके लिए वो मना करतीं।
उनसे ऐसा व्यवहार करके मैंने क्या पाया ?हम दोनों साथ में मिलकर रहतीं तो शायद ,मुझे इस तरह की परेशानी ही नहीं होती।
अभी सुमति इन्हीं परेशानियों से जूझ रही थी तभी उसकी मम्मी का फोन आया, उन्होंने ,उससे शिकायत की - तेरी भाभी तो नौकरी भी नहीं करती है और घर का कोई काम नहीं करना चाहती। मैं इस उम्र में कब तक घर के काम करती रहूंगी ? ये बहुएं तो ऐसी आ गई हैं, ये तो इंसान को इंसान ही नहीं समझ रहीं हैं। ये तो जवान होकर भी, ठीक से परिवार को नहीं संभाल पा रही हैं और हमसे उम्मीद लगाए बैठी हैं, कि सारे काम हम ही करें !
हां, मम्मी यह बात तो है, आप लोग, इस उम्र में भी घर को कितने अच्छे से संभाल लेती हैं ? मेरे साथ भी यही समस्या चल रही है। जब मम्मी जी थीं , तो सारा घर संभाल लेती थीं , मुझे कोई चिंता नहीं होती थी। अभी मोंटू के सीढ़ियों से नीचे गिरने से उसे चोट लग गई। आज पहली बार सुमति ने अपनी सास को अपनी मम्मी के सामने 'मम्मी' बोला वरना 'बुढ़िया 'ही बोलती थी।
क्यों तेरी सास को क्या हुआ ?क्या उनकी तबियत ठीक नहीं ,अब तक तो वे ही उसका ध्यान रख रही थीं ?
वह तो ध्यान रख रही थीं किंतु कुछ दिनों के लिए घूमने के लिए चली गई हैं इसलिए मुझे परेशानी हो रही है।
तेरी सास को तो इधर -उधर घूमने का इतना शौक तो नहीं है, फिर वो ऐसे कैसे कहाँ चलीं गयीं ?कहीं तूने तो उन्हें कुछ कहा तो नहीं, कभी वो ,तेरे व्यवहार से खफा होकर चली गयीं हों। आजकल के बच्चों को कुछ पता ही नहीं रहता ,कब क्या बोलना है ,क्या नहीं ?
नहीं, मम्मी ऐसी तो कोई बात नहीं है। अच्छा ,अभी फोन रखती हूं ,अभी ज्यादा समय नहीं दे पाऊँगी ।
