Khoobsurat [part 45]

शिल्पा, नियत समय पर तैयार होकर, होटल के बाहर खड़ी थी। कुमार ने, उसे 'रोमानिया होटल' में आने के लिए कहा था इसीलिए वह बाहर खड़ी होकर, कुमार की प्रतीक्षा कर रही थी। मन ही मन सोच रही थी - कायदे से देखा जाए तो कुमार को मेरी प्रतीक्षा में खड़े होना चाहिए था और मैं यहां उसकी प्रतीक्षा में खड़ी हूं।  वह अकेले होटल के अंदर नहीं जाना चाहती थी, इस तरह कभी वह अकेली होटल में गई भी नहीं थी। शिल्पा बार-बार घड़ी देख रही थी, न जाने कैसे-कैसे झूठ बोलकर आई हूँ ?किंतु कुमार अभी तक नहीं आया। 


 उसी स्थान पर खड़े-खड़े शिल्पा सोच रही थी -जब वह तैयार हो रही थी, तब नित्या ने तो पूछ ही लिया था- इतनी सज -धजकर कहां जा रही हो ?मम्मी को मैंने पहले ही यह बात,बता दी थी' कि किसी सहेली के जन्मदिन पर जा रही हूँ ,उन्होंने विश्वास भी कर लिया किंतु नित्या इतनी जल्दी विश्वास करने वाली नहीं थी ,इसलिए उसने ,नित्या को कुछ रुखा सा जवाब दिया, जिससे वह दोबारा और प्रश्न पूछने का साहस ही न कर सके ,तब भी नित्या बोली - बहुत दिनों से मैं देख रही हूं, तुम बदलती जा रही हो। 

यह जीवन ही परिवर्तनशील है ,एक समय पर हर किसी को बदलना पड़ता है , यदि मुझमें कोई परिवर्तन होता भी है तो इसमें बुराई ही क्या है ? उम्र के एक पड़ाव पर हमको और अपने आप को,अपने  विचारों को बदलना ही पड़ता है। तुम कब तक इन्हीं दक़ियानूसी विचारों में लिपटी रहोगी,कहाँ जा रही हो ,क्यों जा रही हो ,किसके साथ जा रही हो, कब तक मेरी चौकीदारी करोगी ?मुँह बनाते हुए शिल्पा ने कहा।  

मैं तुम्हारी, कोई चौकीदारी नहीं कर रही हूं, बस मैं, चाहती हूं, तुम किसी गलत राह पर मत चलना और ये मत भूलो !बुआजी ,मुझे तुम्हारे लिए ही यहाँ लेकर आई थीं ताकि हम दोनों का साथ बना रहे ,तुम इस तरह का व्यवहार करके, क्या समझती हो ? मैं तुमसे नाराज़ हो जाउंगी और तुमसे बात नहीं करूंगी ,न ही तुमसे बाहर जाने का कारण पूछूँगी किन्तु ये तुम्हारी ग़लतफ़हमी है क्योंकि जो अपने होते हैं ,वो हर परिस्थिति में अपनों का ख़्याल रखते हैं।  

तुम्हें ऐसा क्यों लगता है? कि मैं किसी गलत राह पर चल रही हूं ?

 तुम्हारे बदले हुए व्यवहार से नित्या स्पष्ट बोली, क्या मैं पूछ सकती हूं,तुम्हारी उस सहेली का क्या नाम है ?

क्या तुम मेरी सभी सहेलियों को जानती हो ?

शिल्पा ने नित्या से ही प्रश्न किया ?

नहीं, तो फिर ऐसा प्रश्न पूछ ही क्यों रही हो, जिसका जवाब तुम्हारे पास भी नहीं है, मन ही मन बुदबुदाई -  इस सवाल का जवाब तो मेरे पास भी नहीं है, मैं तुमसे कह भी नहीं सकती कि मैं कहां जा रही हूं और क्यों जा रही हूं ?

मेरा प्रश्न पूछना बनता है क्योंकि तुमसे उम्र में बड़ी होने के साथ -साथ मैं, नहीं चाहती कि तुम फिर से कहीं फंस जाओ !जिस तरह अभी कुछ दिन पहले फंस गयी थीं ,अभी उसका ही पता नहीं चला कि किसने इतनी बड़ी गलती की है ?वो कुमार भी मेरा फोन नहीं उठा रहा ,क्या अब तक वो बिमार ही होगा ?मुझे तो ये सब उसी का किया -धरा लगता है ,तभी तो नजरें चुरा रहा है। देखा नहीं ,मेरी जानकारी लेने के लिए मेरे कॉलिज तक आ गया और तुम उसी कॉलिज में रहकर भी, उसके विषय में कोई जानकारी न ले सकीं। 

शिल्पा को ,वहां खड़े हुए लगभग आधा घंटा हो गया किंतु अभी तक कुमार नहीं आया था अब वह विचलित होने लगी थी समय बढ़ता जा रहा था।  उसे घर भी तो वापस जाना है,तभी उसके मन में, नित्या की कही बातें गूँजने लगीं,कहीं उसकी कही बातें सच तो नहीं हैं ,आज भी मुझे......  यही विचार उसके मन में आ जा रहे थे। अब वह क्या करें ? वापस जाएं ,हाथ में लिए हुए उस उपहार को, जो उसने रास्ते में ही खरीदा था देख रही थी। इसे घर भी तो नहीं ले जा सकती, फिर सोचा -'साहस करके होटल के अंदर ही पहुंच जाती हूं, वह मेरी प्रतीक्षा करते हुए स्वयं ही यहां आ जाएगा। आधा घंटा और प्रतीक्षा करती हूं, उसके पश्चात मैं चली जाऊंगी।

 यह सोचकर वह उदास मन से ,होटल में प्रवेश करती है,उसने आस -पास नजर डाली कि कहाँ बैठा जाये ? तभी उसे जाना- पहचाना सा चेहरा और कद- काठी नजर आती है। वह उसकी तरफ बढ़ती है तब उसे आश्चर्य होता है मैं इसकी प्रतीक्षा बाहर कर रही हूं और यह यहां आराम से ,बैठा हुआ है किंतु ऐसे समय में उससे कुछ कह भी नहीं सकती। गलती, उसकी भी नहीं है मैंने ही, अंदर आकर देखने का प्रयास ही नहीं किया ,अब उससे क्या शिकायत करना ?यह सोचते हुए ,वह झट से उसके पीछे जाकर कुमार की आंखें बंद कर लेती है और कहती है -'जन्मदिन की बहुत -बहुत शुभकामनायें !''

 कुमार जो उसकी प्रतीक्षा में बड़ी देर से बैठा हुआ था।  वह नाराज होते हुए बोला -तुम अब आ रही हो तुमने तो 6:00 बजे का समय दिया था और अब 6:30 से ऊपर हो रहे हैं। वह क्या शिकायत करेगी, कुमार तो स्वयं ही, अपनी  शिकायतों का पिटारा लिए हुए बैठा था। 

तब शिल्पा ने उसकी आंखों से अपने हाथ हटाए और उसके सामने आकर बोली -मैं आधे घंटे  से बाहर खड़ी थी, मैं सोच रही थी -'जब तुम आओगे, तो अंदर जाऊंगी' लेकिन मुझे क्या मालूम था ?तुम आराम से यहां बैठे हुए हो, और मैं बाहर, इतनी देर से गर्मी में तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही थी। 

अच्छा, तुम बाहर क्यों खड़ी थी ?तुम्हें शीघ्र अंदर आना चाहिए था।

 अकेले आने का साहस नहीं कर पा रही थी, सोचा था ,तुम मेरा स्वागत करोगे ,तुरंत ही अपनी सोच को झुठलाया और बोली -खैर छोड़ो ! अपने जन्मदिन पर क्या-क्या कर रहे हो कहते हुए उसने जो उपहार कुमार के लिए लेकर आई थी , वह उसके सामने रख दिया।

 इसकी क्या आवश्यकता थी, तुम्हारी मम्मी ने पूछा नहीं होगा- यह उपहार किसके लिए ले जा रही हो ?

मम्मी को तो जब पता चलेगा ,तभी तो पूछेंगी, उन्हें तो मालूम ही नहीं है कि मैंने कोई उपहार भी लिया है जब से घर गई थी तुम्हारे कामों में लगी हुई थी,उलाहना देते हुए शिल्पा ने कहा। 

तुमने, मेरे लिए ऐसा कौन सा कार्य किया है ,आश्चर्य से कुमार ने पूछा ? 

क्यों ?तुम्हारे लिए तैयार हुई ,तुम्हारे लिए उपहार खरीदा ,जब से कॉलेज से आई थी, सारा वक्त मैंने  तुम्हें सोचकर और तुम्हारे लिए ही व्यतीत किया, यह क्या कम बड़ी बात है ? आजकल ,इतना समय दूसरों के लिए कौन जीता है।  तभी एक छोटा सा केक लेकर एक वेटर आ जाता है।

 उसे देखकर शिल्पा कहती है -कितना प्यारा केक है, बहुत ही खूबसूरत है,अब इसे काट भी दो !



laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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