'महत्वाकांक्षा 'लिए अपने दम पर, वो शहर गया।
देखी,शहर की चकाचौंध ,अपना उद्देश्य भूल गया।
शहर की भूल -भुलैया ,गलियों में भटक गया ,
भटकता -भटकता ,न जाने कहाँ पहुंच गया ?
जिस राह चला वो ,उस राह को जैसे भूल गया ,
तब किसी फ़रिश्ते ने ,उसे एहसास दिलाया।
भटका इन गलियों में तूने, क्या खोया ,क्या पाया ?
सम्भल जा !अब भी ,किस उद्देश्य से यहाँ तू आया ?
जीने का सही राह दिखा ,उसे सही सबक सिखलाया ,
तब उसे अपनी ,''महत्वाकांक्षा'' का स्मरण हो आया।
