वो भी क्या जमाने थे ?
जब घर बड़े...... ,
खिड़कियां छोटी थीं।
खिड़कियों ने ही...... ,
मोहब्बत के दामन थामे थे।
वाह ! क्या खूब नजारे थे ?
अब खिड़कियां कम ही खुलती हैं ,
ठीक हमारे दिलों की तरह....
ही लोगों से कम मिलती हैं।
बाहर का नज़ारा.... ,
सुहाना दिखे न दिखे ,
किन्तु इक ड़र सा है...
खिड़की के रस्ते ही सही ,
घर और ज़िंदगी तबाह न करे।
किसी कीट की तरह ,
ज़िंदगी बर्बाद न करे।
इनका प्रकोप जब होता है ,
दिन में तारे दिखलाता है।
खिड़की के रस्ते ,कोई हसीना ही दिख जाये ,
कहीं ऐसा न हो ,मेरी दुनिया ही बदल जाये।
