Khidaki

 वो  भी क्या जमाने थे ?
 जब घर बड़े...... ,
 खिड़कियां छोटी थीं। 
 खिड़कियों ने ही......  ,
मोहब्बत के दामन थामे थे। 
 वाह ! क्या खूब  नजारे थे ?
 बंद घरों में......  ,

अब खिड़कियां कम ही खुलती हैं ,
 ठीक हमारे दिलों की तरह.... 
 ही लोगों से कम मिलती हैं। 
 बाहर का नज़ारा....  ,
 सुहाना दिखे न दिखे ,
 किन्तु इक ड़र सा है... 
 खिड़की  के रस्ते ही सही ,
 घर और ज़िंदगी तबाह न करे।
 किसी कीट  की तरह ,
 ज़िंदगी बर्बाद न करे। 
 इनका प्रकोप जब होता है ,
 दिन में तारे दिखलाता है। 
खिड़की के रस्ते ,कोई हसीना ही दिख जाये ,
 कहीं ऐसा न हो ,मेरी दुनिया ही बदल जाये। 
laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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