Asi bhi zindgi [part 94 ]

सड़क पर बहुत भीड़ हो रही थी , आजकल विवाह -शादियों का  सीज़न है , बारात निकलती है ,चढ़त होती है।तब सड़क से निकलना बहुत ही मुश्किल हो जाता है। जिधर देखो ! गाड़ियां ही गाड़ियाँ ,एक कदम आगे बढ़े ,फिर रुक गए ,जहाँ पंद्रह मिनट या आधा घंटे में , पहुंच सकते  हैं  ,उसी स्थान में पहुंचने में ,अभी दो घंटे तो हो गए किन्तु प्रभा की गाड़ी भीड़ में अभी भी अटकी हुई है। उसने गाड़ी में बैठे -बैठे ही गाने चला रखे हैं ,' हेडफ़ोन  'पर गाने सुन रही है ,किन्तु बीच -बीच में ,आँखें खोलकर देख लेती है ,कि अभी तक कहाँ पहुंचे ? जब बहुत देर हो गयी ,तब अपने पापा से बोली -पापा ,यार.... इससे तो बेहतर था ,किसी रेस्त्रां में ,आराम से बैठकर खाना खा लेते। गाड़ी में बैठे -बैठे दो घंटे हो गए , मैंने अपना कितना कार्य छोड़ा हुआ है ? मैं अपनी कहानी को आगे बढ़ा सकती थी ,यहाँ इस तरह बैठे -बैठे मेरा समय वेस्ट हो रहा है। 


बेटा ,शादी -विवाह में भी तो  जाना जरूरी होता है ,ऐसा सब सोचने लगें तो कोई भी शादी में न जाये। पंडाल खाली पड़ा रहे। हर चीज को 'एन्जॉय 'करना चाहिए। 

इसमें क्या ''एन्जॉयमेंट ''है ?दो घंटे से गाड़ी में बैठे हैं , तिलभर को गाड़ी खिसकती है फिर वहीं के वहीं ,ऐसा लग रहा है ,आज ही सबकी शादी है। 

हाँ ,आज बहुत बड़ा साया है ,जिनकी शादी है ,उनके रिश्तेदार तो आएंगे ही ,ये मेरी सहेली है ,कई बार फोन किया था -उर्मि तुझे आना जरूर है ,वरना मैं भी न जाती ,तुमसे इसीलिए तो कह रही थी ,जल्दी तैयार हो जाओ ! किन्तु तुमने तो कहना न मानने की कसम खाई हुई है। आठ बजे का खाना है ,और हमें आठ यहीं बज गए। खाना भी मिलेगा या नहीं ,तुम भी जल्दी ही ,इसके हाथ भी ,अगले साल तक पीले कर दो। हम भी इसके नखरों से बचे रहेंगे। 

तभी उनकी गाड़ी के शीशे में ,मोटरसाइकिल पर सवार , इंस्पेक्टर विकास खन्ना दिखता है। वो भी जगह न मिल पाने के कारण खड़ा ही था। प्रभा ने अपनी गाड़ी का शीशा  खोला और इंस्पेक्टर की तरफ को हाथ हिलाया किन्तु उसका ध्यान दूसरी तरफ था। 

उर्मि जी ने टोका ,ये क्या बच्चों वाली हरकत है ?देख नहीं रही हो, कितनी भीड़ है ?

उस समय प्रभा के कानों में ,''काश !कोई लड़का मुझे प्यार करता ''चल रहा था। उस गाने का चलना और इंस्पेक्टर साहब का दिखना ,उसे रोमांटिक किये दे रहा था। वो मस्ती में झूमते हुए बोली -अभी तो आप कह रहीं थीं ,हर मूवमेंट को एन्जॉय करना चाहिए। वो आवाज भी लगा देती किन्तु पापा के कारण अपने को रोके हुए थी। तभी विकास ने एक नजर इधर -उधर घुमाई ,प्रभा ने उसी मौक़े का लाभ उठाकर ,उसको अंदर से ही ,जतला दिया कि हम भी इस भीड़ में शामिल हैं। प्रभा को देखकर वो मुस्कुराया और थोड़ी सी जगह मिलते ही ,आगे बढ़ गया। प्रभा को बुरा लगा ,वो तो सोच रही थी ,कुछ सहायता करेगा ,या फिर अपनी बाइक पर ही बिठाकर ले जाता ,कितना अच्छा लगता ? मैं और वो ! जब तो  कह रहा था ,हम जनता की सेवा के लिए हैं ,और अब देखो !फुर्र से निकल गया। अब नहीं सोचा ,जनता परेशान हो रही होगी।रूढ़ कहीं का , प्रभा के पिता ने बाहर निकलने का प्रयत्न  भी किया किन्तु दरवाजा खोलने के लिए भी ,जगह ही  नहीं थी ,तभी उनकी गाड़ी आगे बढ़ चली। 

चलो !अच्छा ही हुआ ,अब हम भी आगे निकलेंगे , देखें कितनी दूर जायेगा ?अब मिलने आएगा तो बात ही नहीं करूंगी ,अपने मतलब से बात करने आ जाता है। वो गाना अभी भी उसके कानों में लगातार बजे जा रहा था ,जो उसकी सोच में व्यवधान डाल  रहा था। सबसे पहले उसने ,वो गाना बंद किया ,अभी कुछ देर पहले तो उसे ये गाना उसे अच्छा लग  रहा था , यही गाना अब उसे परेशान करने लगा ,अब गाड़ी आगे बढ़ रही थी और प्रभा का मन ,इंस्पेक्टर साहब से ,मन ही मन नाराज़ हुए बैठा था। कुछ आगे चलकर ,उसने देखा ,विकास सड़क पर खड़ा होकर ,गाड़ियों को आगे बढ़ाने में मदद कर रहा था। उसे देखते ही प्रभा का क्रोध न जाने किस कोने में घुस गया ? भई !इंस्पेक्टर है ,अच्छे -अच्छे ड़र जाते हैं प्रभा का क्रोध भी न जाने कहाँ छिप गया ? 

प्रभा की गाड़ी भी, उधर ही एक जगह खड़ी की गयी ,क्योंकि उन्हें जिस मंडप में जाना था ,वो वहीँ था। प्रभा तेजी से गाड़ी से उतरी और उसने विकास के सामने अपनी उपस्थिति दर्ज़ करा ही दी । 

वो मुस्कुराकर बोला -लेखिका साहिबा !अब तो खुश ! हमने आपके लिए ,रास्ते ख़ाली करवा दिए। 

अच्छा..... तो आप यहाँ जनता की सेवा में तल्लीन थे और हम तो कुछ और ही सोचे बैठे थे। 

तब तक प्रभा के मम्मी -पापा भी ,उनके पास आ गए। उसके पापा ने ,इंस्पेक्टर को देखा फिर अपनी बेटी को... पापा इनसे मिलिए -आप हैं ,''इंस्पेक्टर विकास खन्ना '' जिनके जीवन पर मैं कहानी लिख रही हूँ ,उन्हीं का केस ,ये देख रहे हैं। 

ओह !अच्छा -अच्छा ,कहकर बोले -चलिए !अंदर चलते हैं। व्यंग्यात्मक लहज़े में बोले - हम इतने लेट हो गए ,खाना भी बचा होगा या नहीं कहकर हँसते हुए आगे बढ़ गए। 

प्रभा बोली -इंस्पेक्टर साहब !आप भी चलिए !

भई मैं क्या करूंगा ?वहां जाकर..... मैं किसी को जानता -पहचानता नहीं , ''बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना '' 

मैं तो जानती हूँ ,और ये शादी मेरी मम्मी की सहेली के बेटे की है। आपसे कोई नहीं पूछेगा ,चलिए आप !

विकास ने घड़ी में समय देखा ,ग्यारह बज रहे हैं ,भूख भी जोरों की लगी है ,चलो !यहीं खा लेता हूँ ,सोचकर प्रभा के साथ हो लिया।

 श्रीमती और श्रीमान शर्मा जी आगे निकल गए थे , अपनी पत्नी से बोले -प्रभा कुछ ज्यादा ही नहीं हिलमिल रही, इस इंस्पेक्टर से ,पता नहीं ,कौन है ,कहाँ का है ?

जी ,मैं इससे पहले भी मिल चुकी हूँ , अच्छा लड़का है। 

फिर भी तुम..... फ़िलहाल अपनी बेटी पर ध्यान रखो। 

हमारी बेटी समझदार है , उसने हमसे कुछ छिपाया थोड़े ही है , उसकी गलत सोच होती , या इनके बीच कुछ गलत होता तो हमसे छिपाती थोड़े ही। 

नमस्कार जी ! की आवाज ने उनका ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया , सामने उर्मिला जी की सहेली खड़ी मुस्कुरा रही थी। 

नमस्कार जी नमस्कार ! कहते हुए वो अपनी सहेली को गले लगाने के लिए आगे बढ़ीं ,बहुत -बहुत बधाई हो ! 

आने में ,बहुत देर कर दी ,घर के लोग ही ,इस तरह देरी से आएंगे तो कैसे चलेगा ?

क्या करें ?बहनजी ! रास्ते में भीड़ बहुत थी , इससे पहले वो उनकी बेटी और इंस्पेक्टर के विषय में कुछ पूछतीं ,पहले ही पहले कहने लगे ,इन इंस्पेक्टर साहब ने हमारी बहुत सहायता की ,जाम से बाहर निकलने में ,तब हम इन्हें भी अपने साथ ले आये। 

अच्छा किया ,चलिये !पहले खाना खा लीजिये ! कहकर उन्होंने हाथ से इशारा किया कि किधर जाना है ? स्वयं किसी कार्य से दूसरी तरफ  निकल गयीं। 

विकास और प्रभा भी, खाने के लिए आगे बढ़े ,अरे ,ये स्टॉल तो बंद हो गयी ,इस पर खाने को कुछ नहीं बचा। दो -तीन स्टॉल बंद हो चुकी थी ,इसमें प्रभा को अपनी बेइज्जती लगी।पहली बार इंस्पेक्टर साहब के साथ खाना खाने आई ,ये भी न.... क्या सोचेंगे ? बोली -थोड़ा लेट क्या हो गए ?खाना ही खत्म हो गया। ये भी कोई बात हुई ,इंतजाम बढ़िया नहीं किया। 

हम लोग ,लड़की वालों की तरफ से हैं ,या लड़केवालों की तरफ से ,विकास ने पूछा। 

लड़केवालों  की तरफ से..... क्यों ?

इसमें उनकी क्या गलती है ? वो अपने इंतजाम में लगे होंगे ,उनकी मेहनत का  पैसा लगा है ,हर जगह तो वो लोग नहीं पहुंच सकते। बात तो पेट भरने से है ,मैं तो सलाद से भी पेट भर लेता हूँ। सबसे पौष्टिक है ,जो भी चीजें हैं ,उन्हें ही खा लेते हैं। इतना सारा तो हम तब भी  नहीं खा पाते। और वो सलाद ,नान और सब्जी लेकर खाने लगा। आओ !तुम भी खा लो ! इस तरह मुझे घूरो नहीं। 

प्रभा ,उसकी  तरफ देखे जा रही थी ,उसने अभी जो कहा ,ये बात उसके दिल को छू गयी ,यदि ये साथ नहीं होता तो वो भी ऐसा ही करती, किन्तु इसी को दिखाने के लिए ही तो ,ये सब बोल रही थी। उसी ने उसे करारा जबाब दिया। 

खाना खाते हुए ,वो बोला -कभी -कभी मुझे लगता है ,तुम एक गंभीर लेखिका नहीं ,वरन एक छोटी बच्ची हो। जो मेरे आगे निकल जाने पर मुझे कोस रही होगी ,हमारी सहायता भी नहीं की ,आगे निकल गया। 

आपको कैसे मालूम  ? मैंने ऐसा कुछ भी नहीं सोचा था। 

चल झूठी ,दिन में कितने झूठों से मिलता हूँ ? एक और सही कहकर हंसने लगा। 

नहीं ,मैंने आपको नहीं कोसा ,


तब मेरी आँखों में देखकर कहो !उसने अपनी गर्दन झुकाई और उसकी आँखों में देखने का प्रयत्न किया।

 प्रभा ने एक पल उसकी आँखों में देखा फिर नजरें नीची कर बोली -मैंने कोसा नहीं था ,बस थोड़ा सा बुरा लगा था।

बस थोड़ा सा ,किन्तु मेरी जीभ तो दो बार कटी थी ,कहकर वो हंसने लगा और बोला - मेरा खाना हो गया ,अब मैं चलता हूँ ,कहकर वो आगे बढ़ गया। उसके मम्मी -पापा से भी इजाजत ली और चला गया। 

लड़का तो अच्छा है ,पता नहीं उसका विवाह हुआ है या नहीं ,उर्मिला जी ने अपने दिल की बात अपने पति से व्यक्त की। 

किन्तु वो शर्मा नहीं ,

लड़का तो अच्छा है ,कहकर वो हंसने लगीं।  

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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