तेरे शब्द ,तेरे भाव ,मेरे मन को छूने लगे हैं ,
न चाहते हुए भी ,मैं उन्हें अब,पढ़ने लगी हूँ ,
दर्द तेरा ,महसूस करने लगी हूँ ,मैं,तेरी होने लगी हूँ।
तूझे सोच ,आँखें मेरी स्वतः ही मूँद जाती हैं।
तेरी बातों को सोच ,मैं ! मुस्कुराने लगी हूँ।
ख्यालों में ,तुझमें समाने लगी हूँ ,मैं ,तेरी होने लगी हूँ।
रहते हो ,हरदम तुम ख्यालों में ,ख़्वाबों में ,
तेरे आने से ,धड़कने महसूस करने लगी हूँ।
लगता है तुम पर मरने लगी हूँ ,मैं ,तेरी होने लगी हूँ।
तुम्हें देखते ही, मैं कुम्हलाई सी,अब खिलने लगी हूँ ,
तेरे मौन को ,तेरी मुस्कुराहटों को, समझने लगी हूँ।
कैसा? ये दर्द है ,जो अब जीने लगी हूँ ,मैं ,तेरी होने लगी हूँ।
