शतरंज की चालें नहीं आतीं ,
कैसी ,भी राजनीति नहीं भाती।
ऊंट की तिरछी चाल ,नहीं चली जाती।
घोड़े की तरह ,ढाई डिग भरना नहीं आता।
प्यादे के काँधे पर बंदूक रख चलाना नहीं आता।
हाथी की तरह ही सीधी चाल चलती हूँ।
रानी हूँ ,चहुँ और निग़ाहें रखती हूँ।
दुश्मन करे वार ,नहीं बख्शती हूँ।
ज़िंदगी की शतरंज में ,अपनों से मात खा जाती हूँ।
जान है ,जब तक,दुश्मन से कब तक बच पाओगे ?
अपने हक़ पर ,अधिकार किसी और का पाओगे।
किया नहीं बचाव ,घेरे जाओगे ,दुश्मन से मारे जाओगे।
अपने ही कर्मों से ,अपनी पहचान बना जाओगे।
स्मृतियों में ,एक नई छाप छोड़ जाओगे।
शह और मात का खेल नहीं भाता ,
न तुम जीते ,न मैं हारा।
आओ !मिल ज़िंदगी जियें दुबारा।
