Shatrnj ki chal

 शतरंज की चालें नहीं आतीं ,

कैसी ,भी राजनीति नहीं भाती।

ऊंट की तिरछी चाल ,नहीं चली जाती। 

घोड़े की तरह ,ढाई डिग भरना नहीं आता।

प्यादे के काँधे पर बंदूक रख चलाना नहीं आता।



हाथी की तरह ही सीधी चाल चलती हूँ।    

रानी हूँ ,चहुँ और निग़ाहें रखती हूँ। 

दुश्मन करे वार ,नहीं बख्शती हूँ। 

ज़िंदगी की शतरंज में ,अपनों से मात खा जाती हूँ।

 

जान है ,जब तक,दुश्मन से कब तक बच पाओगे ?  

अपने हक़ पर ,अधिकार किसी और का पाओगे।

किया नहीं बचाव ,घेरे जाओगे ,दुश्मन से मारे जाओगे।  

अपने ही कर्मों से  ,अपनी पहचान बना जाओगे। 

स्मृतियों में ,एक नई छाप छोड़ जाओगे। 


शह और मात का खेल नहीं भाता ,

न तुम जीते ,न मैं हारा। 

आओ !मिल ज़िंदगी जियें दुबारा।    

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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