Parvatiya yatra

चाहता नहीं कौन ? शिखर पर चढ़ना। 

प्रकृति से ओत -प्रोत ,पर्वत पर चढ़ना। 



 बुलंदी किसको नहीं पसंद ?औआगे बढ़ना।

 आसान नहीं जीवन में भी, शिखर पर चढ़ना।

 

 सम्भलकर -संभलकर ,डग आगे भरना। 

 लड़खड़ाते ही  ,तब सम्भव है ,नीचे गिरना। 


पहुंच शिखर पर, परचम तुमअपना लहराना।

 नीचे भी ,तुमको आना ,ये कभी भूल न जाना।

 

 शिखर ' सौंदर्य' में ,कहीं तुम ,खो मत जाना।

जिस विश्वास से बढ़े आगे ,उसे मत झुठलाना।


पर्वत की भांति, तुम भी कठोर ,मत बन जाना।  

कठोर जीवन इसका ,जितना लगता है ,सुहाना।

 

इस यात्रा में ,''मैं ''कभी न....  अपने मन में लाना। 

कितना भी तुम ?ऊपर चढ़ लो !वापस तुमको यहीं पर आना। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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