Mobile game

आजकल दूरसंचार  के साधनों में ,फोन ही नहीं , मोबाईल फोन बहुत ही लोकप्रिय हो गया है ,वो भी'' स्मार्ट फोन ''क्योंकि अब ये बातचीत का माध्यम ही नहीं रह गया है वरन अब इससे ,अन्य चीजें भी जुड़ चुकी हैं जैसे -इस पर अपने संदेश  लिखित रूप में  भी भेज सकते हैं ,इस कारण से इसने ,हमारे  कबूतर जा जा की  तर्ज पर जो पत्र आते थे ,उनकी भी छुट्टी करा दी। इतना ही नहीं इसमें गाने सुनने ,समाचार पढ़ने -सुनने की भी सुविधा बढ़ गयी है। अब तो वीडियो के माध्यम से दुनिया भर के समाचार देख -सुन सकते हैं। 

इस बात को ज्यादा लम्बा न खींचते हुए ,अब हम आते हैं ,वीडियोगेम की तरफ ,समय गुजारने के लिए इस फोन में ,एक दो ही नहीं ,न जाने कितने खेल आ गए ? जो समय व्यतीत करने के लिए अच्छा है किन्तु पढ़ने वाले बच्चों के लिए तो सही नहीं है। कई बार तो इतने दिलचस्प खेल होते हैं , खेलते  समय ,समय का पता भी नहीं चलता, किन्तु यही खेल यदि बच्चा खेलता है ,तो उसकी शिक्षा के साथ- साथ ,उसकी आँखों को भी नुकसान होगा। कई बच्चों को तो खेल की इतनी लत लग गयी ,जैसे- किसी शराबी को शराब की ,नशेड़ी को नशे की लत लगती है। कई बच्चों ने ,एक खेल ऐसा था जिसके कारण ,अपने हाथों की नस काट ली और अपनी जान से उन्हें हाथ धोना पड़ा। वैसे आज वो खेल बंद कर दिया गया है। 

उसके पश्चात ,ऑनलाइन ही एक खेल और आया ,उसका नाम था ''पब्जी ''जिसने मेरे को भी बहुत छकाया। अस्सी -नब्बे प्रतिशत नंबर लाने वाला मेरा बेटा ,पच्चहत्तर -अस्सी पर ही लटक कर रह गया। सारा दिन उसकी निगरानी ,अब वो भी बंद हुआ ,तब थोड़ा आराम मिला। 

ये खेल रोचक तो बहुत होते हैं ,किन्तु इनके कारण बच्चे घर में ही बैठे रहते हैं ,बाहर खेलने नहीं निकलते। जिसके कारण उनका स्वास्थ्य ,उनकी आँखें ,नींद पूरी न होना ,पढ़ाई में मन न  लगना इत्यादि समस्याएँ आती हैं। बच्चा अपने तक ही सीमित रह जाता है ,व्यवहारिक कुशलता की उसमें कमी आई है। आगे बढ़ने की सोच कुंठित होकर रह जाती है।

अब तो पढ़ाई भी ,मोबाईल या लेपटॉप पर हो रही है ,तब भी माता -पिता की परेशानी बढ़ी है ,ये देखने के लिए कि बच्चा किसी अन्य 'एप 'पर तो नहीं घूम रहा और स्कूल वाले ,तब भी अपना  पूरा शुल्क लेते हैं। माता -पिता के खर्चों  में बढ़ोतरी भी  हुई ,बच्चों को फोन व लैपटॉप खरीदकर देने का खर्चा ,उसके ऊपर से नेट का खर्चा। 
पहले माता -पिता अपने बच्चों से निश्चिन्त रहते थे ,कुछ को तो पता भी नहीं होता था कि हमारा बच्चा कौन सी कक्षा में है ?मासिक शुल्क भी इतना अधिक नहीं था , न ही माता -पिता दबाब में जीते थे ,न ही बच्चों पर किसी तरह का दबाब था और बच्चे कामयाब भी हो जाते थे ,किन्तु आज माता -पिता और बच्चे दोनों ही दबाब में जी रहे हैं। ऐसे में ,थोड़ा खेल ही लिया तो क्या बुराई है ? किन्तु इनसे मानसिक थकावट के साथ -साथ ,आँखों पर भी दबाब बनता है ,और शरीर भी बिगड़ता है। किन्तु करें भी क्या ?परिस्थितयां ऐसी ही बनती जा रही हैं वो मोबाईल से न चाहते हुए भी बच नहीं पाता ,खेलना भी पड़  ही जाता है। 

आप ये देखिये ,हम बड़े अपने बच्चों से फोन के 'फीचर्स ''के विषय में पूछते थे ,उनसे गेम खेलना सीखते थे , ये सब बिना सिखाये ही ,बच्चे कैसे सीख जाते हैं ?किन्तु पढ़ने को कह दीजिये ,तब उन्हें कुछ भी जानकारी नहीं होगी। हमारे लिए ,ये रोचक ,सुविधाजनक वस्तु कभी -कभी ,चिंता का विषय लगने लगती है।बच्चे  हैं ,तो बच्चों वाली हरकतें ही करेंगे ,जब हम जैसे बड़े भी खेलने लग जाते हैं ,बस थोड़ा ध्यान रखने की आवश्यकता है।  
laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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