न जाने.....
कौन देस से ?आये पंछी !
जा पहुंचे ,अनजान डगर से,
अनजान नगरिया......
भाँति -भाँति के जीव उसमें ,
लगती जैसे, ख्वाबों की दुनिया।
इस दुनिया के जीव निराले ,
कभी रोते ,कभी हँसते ,
कभी करते, ताता थैया।
उम्मीदों के पेड़ लगाते ,
लालच का फ़ल हैं ,पाते।
लोभ में आकर ,मारे जाते।
'जादुई दुनिया '' में फंस जाते।
उसी के होकर ,रहना चाहते।
इस दुनिया का मर्म समझ न पाते।
न जाने ,कितने आते ,कितने जाते ?
इसके जादू का मोह ! त्याग न पाते।
मानव होकर भी ,'पृथ्वीवासी' कहलाते।
