Asi bhi zindgi [part 74 ]

 इंस्पेक्टर' विकास खन्ना ' के पास एक ग़ुमनाम फोन आता है ,कि धीरेन्द्र ने आत्महत्या नहीं की वरन उसकी हत्या हुई है। तब धीरेन्द्र गुप्त रूप से, उसके केस की तहक़ीकात कर रहा है। ये नहीं ,कि वो उस ग़ुमनाम फोन के कारण ही ,उस केस की तहकीकात कर रहा है ,नहीं ,वो स्वयं भी जानना चाहता  है कि इतना शातिर कौन हो सकता है ?जो इतनी भीड़ में ,अपने काम को अंजाम दे गया और  क्यों ? क्योकि उसे भी लगता है ,धीरेन्द्र ने आत्महत्या नहीं की। इसीलिए उसने हवलदार चेतराम को , धीरेन्द्र  और धीरेन्द्र से जुड़े लोगों की जानकारी निकालने में लगा दिया। धीरेन्द्र के माता -पिता का भी यही कहना था ,वो आया था और इस कोठी पर अपना अधिकार जतला रहा था और अपना हिस्सा मांग रहा था ,तब हमने उसे इस कोठी में उसका हिस्सा देने से इंकार कर दिया। कारण पूछने पर बताया ,वो इस कोठी को भी बेच डालता ,हमें भी सड़क पर ले आता। 


नीलिमा अपने व्यवहार से सभी संस्थावालों का दिल जीत रही थी ,और लोगों को भी उससे जुड़ने के लिए प्रोत्साहित करती और अधिक से अधिक चंदा भी दिलवाती। उसे स्कूल की अध्यापिका के रूप में तो नहीं किन्तु लोग उसे एक'' कर्मठ माँ'' के रूप में जानने लगे ,कैसे वो ,अपने बच्चों को अच्छे से अच्छी परवरिश दे रही है ?और अपने बेटे का का सहारा बनकर खड़ी है। अब तो अख़बार की सुर्ख़ियों में भी उसका नाम आ गया। मिडिया के माध्यम से भी लोग उसे जानने लगे। एक दिन अख़बार में खबर छपी -''जब माता -पिता अपने बुढ़ापे के लिए सहारा ढूंढते हैं ,''आज माँ बनी,अपने बेटे का सहारा ''इस शीर्षक पर सभी लोगों के लिए नीलिमा एक चेहरा बन गयी। लोग उसकी कहानी जानने में रूचि दिखाने लगे और उसकी ही नहीं उससे जुड़ी संस्था की भी ,अधिक से अधिक सहायता करने लगे। 

एक दिन ,उसका जेठ उसके घर आया ,उस समय नीलिमा की बेटियां ,अपनी  किसी दोस्त के यहाँ उसके जन्मदिन पर गयी हुईं थीं। तब तक चम्पा भी जा चुकी थी। उसे  देखकर नीलिमा ,बड़े होने के नाते सर ढककर पांव छूने चली ,तभी बिजेंद्र ने उसे अपने दोनों हाथों से ऐसे उठाया जैसे उसे अपनी भुजाओं में भर लेना चाहता हो ,तभी संभलकर बोला  -धीरेन्द्र के जाने पर ,तुम्हारे तो बड़े ठाठ हो गए ,तुम्हें देखकर कोई कह भी नही सकता कि तुम तीन बच्चों की माँ और विधवा हो।

नीलिमा ने तब भी उसकी बात पर कोई ध्यान नहीं दिया ,और बोली -मम्मी -पापा कैसे हैं ?

ठीक ही हैं ,उस दिन को कोसते हैं, जिस दिन वो उस घर में आया ,मम्मी तो रोती  रहती हैं ,उनका बेटा केेसा भी था ? जिन्दा तो था। 

नीलिमा ने गहरी साँस ली ,और बोली -जो हो गया ,सो हो गया ,अब उसे लौटाया तो नहीं जा सकता। 

बिजेंद्र उसे गहरी नजरों से देख रहा था ,उसका मांसल बदन ,आज भी सुडौल है ,उसका गौर वर्ण जैसे दमक  रहा है। आज तक उसने इससे पहले कभी इसे ऐसे  देखा नहीं था ,मेरी पत्नी तो इसके सामने कुछ भी नहीं थी किन्तु मेरे घर में ही हीरा कोयले की तरह पड़ा है। तब तक नीलिमा चाय बनाने लगी। उसे देखकर बोला -कोई परेशानी तो नहीं। 

नीलिमा ने अपने जेठ की तरफ देखा ,और सोचने लगी ,आज पूछ रहे हैं ,इतने दिनों से कहाँ थे ?प्रत्यक्ष बोली - सब ठीक है , एक स्कूल में पढ़ाने जाती हूँ। 

नीलिमा का रहन -सहन देख ,बोला - कितने मिल जाते होंगे ?

बस काम चल जाता है , उसने संक्षिप्त सा जबाब दिया। वैसे आज इस तरफ...... किसी काम से आये हैं ?

अरे हाँ ! मैं बताने आया हूँ ,पापा वो कोठी बेच रहे हैं। 

कह रहे हैं ,अब मेरी भी पत्नी नहीं ,तुम्हारा पति भी नहीं रहा....... इससे पहले कि वो अपनी बात पूरी कर पाता ,नीलिमा बोल उठी -अब भी हमें हमारा हिस्सा मिलेगा या नहीं। 

अब पापा का मकान है ,वो चाहें जैसा करें उसने विवशता जाहिर की। 

वो तो ठीक है किन्तु उसे लेकर तो ,ऊपर नहीं जायेंगे ,

इसीलिए तो बेच रहे हैं। 

आपको आपका हिस्सा देंगे न.... तो हमें क्यों नहीं ?

हिस्सा लेकर क्या करोगी ?तुम्हारे तो  दो बेटियां हैं ,और एक ये पागल पैदा किया। कौन संभालेगा ?सब। 

भाईसाहब ! ये पागल नहीं है। मेरे बेटे को ऐसे मत कहिये ! हमें जरूरत भी नहीं, ऐसे पैसे की। नीलिमा अपने जेठ की उस बात से व्यथित हो गयी थी। 

बिजेंद्र उसके समीप आया ,तुम तो बुरा मान गयीं ,किन्तु मेरे कहने का अर्थ था ये तो संभाल ही नहीं पायेगा ,मेरे भी कोई बच्चा नहीं ,कहते हुए उसके दोनों कंधे अपनी भुजाओं में भर लिये किन्तु मुझे अभी लगा -यदि हम दोनों चाहें तो सब कुछ सम्भल सकता है। हम दोनों ही बहुत अकेले हैं ,फिर से एक ''नई ज़िंदगी ''की शुरुआत करते हैं। हम दोनों मिलकर एक हो जाते हैं ,हमारा अधूरापन पूर्ण हो जायेगा। तुम भी खुश और मैं भी। 

कोई और दिन होता या फिर धीरेन्द्र की मौत के पश्चात ही, ऐसा हुआ होता तो नीलिमा तुनक जाती किन्तु अब तो धीरेन्द्र को गए हुए भी तीन -चार साल बीत गए ,इस बीच नीलिमा ने बहुत कुछ देखा और सहा है। नीलिमा ने अपने जेठ के हाथों को अपने कंधों से हटाया नहीं ,और बोली -ठीक है ,हम साथ रहेंगे। 

उसके इतना कहते ही बिजेंद्र की तो जैसे बाँछें खिल उठीं ,और वो अपनी सीमा को तोड़कर ,नीलिमा को कसकर अपनी भुजाओं में जकड़ लेता है। तब नीलिमा ने उसे पीछे की ओर ढकेलते हुए कहा -रुक भी जाइये ! अभी बच्चे भी आते ही होंगे।

 बिजेंद्र तो जैसे बहुत ही उतावला हो रहा था ,चलो !ऊपरवाले कमरे में !

कमरे में जाने की क्या आवश्यकता है ? अब तो आप मेरे बच्चों के पापा बन ही जाओगे ,तब उनसे भी तो आपका परिचय होना चाहिए। 

छी... पापा ! किसने कहा ? मैं उनका पापा बनूँगा। 

अभी आपने ही तो कहा ,हम दोनों एक हो जाते हैं। अब हम शादी करेंगे ,उसके बाद आप इन बच्चों के पापा बन जाओगे या नहीं। 

शादी.... तुमसे किसने कहा ?मैं तुमसे शादी करने वाला हूँ। तुम मेरे भाई की विधवा हो ,तुमने सोच भी कैसे लिया ? कि मैं तुमसे शादी करूंगा। 

नीलिमा को क्रोध आ गया और बोली -जब तुम मुझे अपने सीने से लगाने को बेताब हो रहे थे ,तब नहीं सोचा था कि तुम्हारे छोटे भाई की बेवा है। तुमने क्या मुझे हलवा समझा था ? कि कोई भी आयेगा खाकर चलता बनेगा। मैं तुम्हारे आग़ोश में आने को तैयार हूँ ,तुम्हारी गोद में बैठने को तैयार हूँ ,बनोगे !मेरे बच्चों के बाप !उन्हें भी अपनाओगे। पहले तो रिश्ते का लिहाज़ ही नहीं रखा ,अपने छोटे भाई की पत्नी से नाजायज़ संबंध बनाने कोई  हिचक नहीं ,किन्तु उसके बच्चों को अपनाना मंजूर नहीं।' वासना के दरिंदे ,'चले जाओ ?यहाँ से।



अपने लिए इस तरह के अपमानित शब्द सुनकर वो तिलमिला गया ,और बोला -मैं तो सोच रहा था ,उस घर के पैसों में से कुछ टुकड़े तुझे भी डाल दूंगा ,साली अपने ख़सम को तो खा गयी ,हमारे घर का चिराग बुझ गया ,पता नहीं, किसकी औलाद लिए घूम रही है ?अब मुझ पर चपेकना चाह रही है ,तू क्या समझती है ?मैं कुछ समझता नहीं ,न जाने किस -किससे मुँह काला करवाती घूम रही है ? बेटियों को भी ऐसे ही धंधे पर लगा देगी। बिजेंद्र के इतना कहते ही ,एक झन्नाटेदार तमाचा उसके गाल पर आया। 

जब तू आया था मैं तभी समझ गयी थी तू किस नियत से आया है ? जब पति  ही नहीं ,तो उसके टूटे रिश्तों से केेसा संबंध !दफ़ा हो जाओ ! 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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