Zindgi ka safar

' ज़िंदगी का सफ़र 'सुहाना लगता है। 

 इसे जी लो तो ,ख़्वाब सुहाना लगता है।

 

  लोग मिलते हैं अनेक , रिश्ते  भी !

  परखो  तो ,सब बेगाना लगता है।

 


 बेगाना अपना,अपना बेगाना लगता है।

 रिश्तों का ये छल ,पुराना लगता है।

  

कभी -२  ख़ुशियों सा सुहाना लगता है। 

कभी -कभी दुखों का खज़ाना लगता है।


प्यार भरे रिश्ते ,मिलते हैं बहुत...... 

समझो तो हर कोई अनजाना लगता है।

 

जिंदगी के हर पड़ाव में ,लोग मिलते हैं। 

दूर का हर ''ढोल सुहाना लगता'' है।   

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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