ये साज़िश-ए - इश्क़ नहीं तो क्या है ?
पहले तो ,मोहब्बत में ग़ुमराह करता है।
दिल का सुकून छीन , बेचैन ,बेकरार करता है।
मोहब्बत की ख़ातिर ,मिन्नतें बार -बार करता है।
दिल पर ही नहीं ,रूह पर भी इख़्तियार करता है।
मोहब्बत से गुफ़्तगू करने को ,दिल को बेकरार करता है।
ख्यालों में ही नहीं ,ख़्वाबों में भी दस्तक बार -बार करता है।
मिल जाएँ ग़र ,ज़िंदगी में इश्क़ ,मोहताज़ कई बार करता है।
ज़िंदगी पर हक़ अपना न रहा ,जीवन उसके नाम करता है।
घर बना दिया -
ये इश्क़ की साज़िश थी ,उसने इस मुक़ाम पर पहुँचा दिया।
किसी के घर की चिरैया को ,अपने बच्चों की अम्मा बना दिया।
उसने अपने दिल की ही नहीं ,घर की हुकुमरान बना दिया।
उसकी साज़िशों में फंसकर ,इसे ही दिल का सुकूं बना लिया।
उसकी साजिशों का,हमने भी ये सिला दिया ,
अपने आप को मिटाकर ,उसका घर बना दिया।

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