Sajish-e-ishq

ये साज़िश-ए - इश्क़ नहीं तो क्या है ?

पहले तो ,मोहब्बत में ग़ुमराह करता है।

दिल का सुकून छीन , बेचैन ,बेकरार करता है।  

मोहब्बत की ख़ातिर ,मिन्नतें बार -बार करता है। 


दिल पर ही नहीं ,रूह पर भी इख़्तियार करता है। 

मोहब्बत से गुफ़्तगू करने को ,दिल को बेकरार करता है। 

ख्यालों में ही नहीं ,ख़्वाबों में भी दस्तक बार -बार करता है। 

मिल जाएँ ग़र ,ज़िंदगी में इश्क़ ,मोहताज़ कई बार करता है। 

ज़िंदगी  पर हक़ अपना न रहा ,जीवन उसके नाम करता है।

 

घर बना दिया -


ये इश्क़ की साज़िश थी ,उसने इस मुक़ाम पर पहुँचा दिया। 

किसी के घर की चिरैया को ,अपने बच्चों की अम्मा बना दिया। 

 उसने अपने दिल की ही नहीं ,घर की हुकुमरान बना दिया। 

उसकी  साज़िशों में फंसकर ,इसे ही दिल का सुकूं बना लिया।

उसकी साजिशों का,हमने भी ये  सिला दिया ,

अपने आप को मिटाकर ,उसका घर बना दिया।   

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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