Ankahi khvahishen

ख़्वाहिशें अनन्त हैं ,बढ़ती ही जाती हैं। 

पूर्ण होने पर भी ,अपूर्ण रह जाती हैं। 

कुछ इच्छाएं'' अनकही ''रह जाती हैं। 

कुछ कर्त्तव्यों तले ,दबी रह जाती हैं। 

बहुत चीत्कार ,करती चिल्लाती हैं। 


किसी नवजात शिशु की तरह ,

दम घोंटकर ,दफ़न की जाती हैं। 

किसी अजगर की तरह ,पुनः -पुनः ,

फ़न फैलाती ,बढ़ती जाती हैं। 

एक पूर्ण हुई नहीं, कि दूसरी आ जाती है। 

कह दिया ,तो 'अनकही ''कैसे रही ?


ख्वाहिशों की सीढ़ी बना ,

चरण दर चरण ,बढ़ते रहें ,

शब्दों के मोती बिखरते रहें। 

बस, लेखनी मेरी चलती रहे , 

चमक उसकी बढ़ती रहे। 

ख्वाहिशें दिलों में पलती रहें। 

अरमाँ इसी तरह मचलते रहें। 

दिलों में ,भाव पलते रहें ,

समंदर से सीप ,चुनते रहें। 

तमन्नाओं के मोती चमकते रहें। 

आगे और आगे हम बढ़ते रहें। 


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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