ख़्वाहिशें अनन्त हैं ,बढ़ती ही जाती हैं।
पूर्ण होने पर भी ,अपूर्ण रह जाती हैं।
कुछ इच्छाएं'' अनकही ''रह जाती हैं।
कुछ कर्त्तव्यों तले ,दबी रह जाती हैं।
बहुत चीत्कार ,करती चिल्लाती हैं।
किसी नवजात शिशु की तरह ,
दम घोंटकर ,दफ़न की जाती हैं।
किसी अजगर की तरह ,पुनः -पुनः ,
फ़न फैलाती ,बढ़ती जाती हैं।
एक पूर्ण हुई नहीं, कि दूसरी आ जाती है।
कह दिया ,तो 'अनकही ''कैसे रही ?
ख्वाहिशों की सीढ़ी बना ,
चरण दर चरण ,बढ़ते रहें ,
शब्दों के मोती बिखरते रहें।
बस, लेखनी मेरी चलती रहे ,
चमक उसकी बढ़ती रहे।
ख्वाहिशें दिलों में पलती रहें।
अरमाँ इसी तरह मचलते रहें।
दिलों में ,भाव पलते रहें ,
समंदर से सीप ,चुनते रहें।
तमन्नाओं के मोती चमकते रहें।
आगे और आगे हम बढ़ते रहें।
