नमस्कार दोस्तों और बहनों ! आज हम चर्चा करेंगे ,घरेलू हिंसा पर , आज हमारी कामवाली जब आई तो बेहद उदास थी। मैंने उससे पूछा भी ,तो....... उसने कुछ भी बताने से इंकार कर दिया। कुछ समय पश्चात जब मैंने उसके चेहरे और बदन पर निशान देखे तो मुझसे रुका नहीं गया और पूछ ही लिया -क्या तुम्हें तुम्हारे पति ने प्रताड़ित किया ?
नहीं ,ऐसा कुछ नहीं है।
तब तुम्हारे शरीर पर ये निशान कैसे हैं ?
उसने अपने निशान छुपाते हुए कहा ,ये तो ,ऐसे ही,मैं कहीं गिर गयी थी।
तुम नहीं बताना चाहतीं ,ये तुम्हारी इच्छा है ,किन्तु इतना तो मैं जान ही गयी हूँ कि तुम्हे पीटा गया है। हम महिलाओं की यही तो आदत होती है। अपने घर की बात समझकर ,उन बातों को छिपाते रहते हैं और फिर बात धीरे -धीरे बढ़ती जाती है कम नहीं होती।
ऐसा कुछ नहीं है ,दीदी जी !घर की बात है ,पति-पत्नी में थोड़ी बहुत नोक-झोंक तो होती ही रहती है। घर की छोटी -छोटी बातों को इतना बढ़ाया भी तो नहीं जा सकता। हमारे पप्पू के पापा ,बस जब थोड़ी सी शराब पी लेते हैं ,तब अपनी कुछ परेशानी में या नशे में ऐसी हरकत कर जाते हैं वरना वो तो बहुत अच्छे हैं।
उसने ,क्या तुझ पर पहली बार ही हाथ उठाया है ?
उसने एक क्षण मेरी ओर देखा ,और बोली -नहीं......
फिर तू कैसे कह सकती है ?कि वो सही आदमी है।
जी सुबह जब नशा उतर जायेगा ,तब उन्हें अपनी गलती का एहसास होता है ,और वो माफ़ी माँगने लगते हैं।
उसे अपनी गलती का एहसास होता है ,तो पीता ही क्यों है ?
दिनभर के थके -हारे रहते हैं ,मालिक की चार बातें सुनते हैं। बस उसका गुस्सा मन में भरा रहता है ,जिसको भुलाने के लिए पीते हैं।
और पीकर अपना नशा तुझ पर उतारता है। भई ,सभी मेहनत करते हैं तो क्या पी -पीकर घरवालों को पीटना आरंभ कर दें ,तू सारा दिन मेहनत नहीं करती ,तब तू अपने मन का क्रोध किस पर निकालती है ?
जी मैं तो औरत हूँ ,हम में तो पहले से ही सहन शक्ति होती है ,मेरा बाप भी मेरी माँ को मारता था किन्तु मेरी माँ ने ,कभी पलटकर जबाब नहीं दिया। उन्हें देखकर मुझे लगता है ,हम औरतों की ज़िंदगी तो मार खाने के लिए ही बनी है।
नहीं तू गलत है ,औरत अपने पति के कंधे से कन्धा मिलाकर चल सकती है। घर की आमदनी बढ़ाने में उसकी सहायता कर सकती है किन्तु वो इंसान है कोई जानवर नहीं ,जो मार ही सहन करे ,फिर मार सहन करे भी तो क्यों ?कोई तो कारण हो- शराब वो पीता है ,मज़े वो लेता है ,और पीटता भी वही है। कभी वो तुझसे प्यार से बैठकर बातें करता है ,कभी पूछता है ,कि तुझे कोई परेशानी तो नहीं या फिर तेरी मालकिन ने तुझे डांटा तो नहीं। जब वो इस तरह से प्यार भरी बातें नहीं कर सकता ,तब वो मारने का अधिकार कैसे रख सकता है ?
दीदी जी ,ये सब हम लोगों में ही नहीं ,मैंने तो बड़े घरों में भी देखा है ,ये आदमी लोग ये नहीं देखते कि तुम अपनी औरत की कब ,कहाँ ,कैसे बेइज्जती कर रहे हो ?किन्तु औरत हम लोगों में से हो या किसी बड़े घर की ,मैं तो घर -घर काम पर जाती हूँ। मैंने कईयों को पिटते भी देखा है और अकेले में आंसू पोछते हुए भी।
तभी तो कहती हूँ ,कि एक बार आदमी का हाथ उठ गया ,उसे वहीं रोक देना सही रहता है ,वरना उन्हें पीटने की आदत पड़ जाती है और हमें पिटने की। माना कि एक परिवार में अलग -अलग सोच के व्यक्ति रहते हैं किन्तु वे एक -दूसरे के पूरक बनकर भी तो जी सकते हैं किसी में कोई कमी होती है किसी में कुछ एक दूसरे की कमियों को नजरअंदाज कर ,एक दूसरे का सहारा भी तो बन सकते हैं। मैं पूछती हूँ -क्या कमी महिलाओं में ही होती हैं जो वे घरेलू हिंसा का शिकार बनती हैं।
क्यों क्या हुआ ?भाभी जी !दीपा बोली -आज कैसे भाषण दे रही हैं ?
अरे भाषण नहीं दे रही ,मैं जानना चाहती हूँ कि एक महिला ही क्यों ''घरेलू हिंसा ''का शिकार होती है ?
ये बात आपने सही कही ,वे महिलायें ही घरेलू हिंसा का शिकार ज्यादा होती हैं ,जिनका दूसरा कोई सहारा नहीं होता मज़बूरीवश वो वहीं रहती हैं और समय और ज़िंदगी से समझौता कर लेती हैं।
वे भी इस'' घरेलू हिंसा '' का शिकार होती हैं ,जो ऐसे ही वातावरण में पलती -बढ़ती हैं ,वे चाहकर भी विरोध नहीं कर पाती हैं ,उन्हें लगता है -यही औरत की ज़िंदगी है।
चम्पा बैठी हुई ,सभी के विचार सुन रही थी ,तभी बोली -ये मुई शराब भी न ,सब कुछ भुला देती है ,इसके नशे में भी आदमी आपा खो बैठता है।
वो पीता ही क्यों है ?जो चीज हमारे परिवार और हमारे लिए नुकसानदायक है ,उसको पीने की आवश्यकता ही क्या है ?रेनू ने पूछा।
वो तो मैडमजी ! दिनभर की थकान मिटाने के लिए ,थोड़ी से ले लेते हैं ,नींद अच्छी आ जाती है।
क्यों ?जब आदमी दिनभर मेहनत करेगा ,थकावट के कारण तो उसे वैसे ही नींद आ जानी है ,शराब के पैसों से ,ताकत की कोई चीज खा सकता है ,फ़ल खा सकता है। खाने -पीने को पैसे नहीं होंगे शराब को पीने के पैसे न जाने कहाँ से आ जाते हैं ?
अरे छोडो !पीने वाला व्यक्ति उधार लेगा किन्तु पियेगा ,अवश्य !
ये सब छोड़िये !यहाँ बात शराब पीने के विषय में नहीं चल रही ,वरन ''घरेलू हिंसा ''के विषय में चल रही थी। इस चर्चा से ,हम ये सोचते हैं ,घरेलू हिंसा को बढ़ावा हमारे ही कारण बढ़ता है क्योंकि हम उसे बढ़ने देते हैं। कभी परिवार की इज्जत की ख़ातिर ,कभी मजबूरी के कारण किन्तु मेरा मानना है। जहाँ तक हो सके गलत का विरोध करना ही चाहिए ,जितना आप दबोगे और दबाया जायेगा। मैं ये नहीं कहती कि तुम भी उसके विरुद्ध हथियार उठा लो या फिर मारपीट करो। किन्तु परिस्थिति के आधार पर किसी भी गलत बात का विरोध आवश्यक है। अब यहीं समाप्त करते हैं फिर मिलेंगे।
