दो हजार सत्तर में हम न होंगे ,
हमारे क़दमों के निशाँ होंगे।
न रीति ,न रिवाज़ होंगे ,संस्कार भी,
किसी कोने में पड़े सिसकते होंगे।
जात -पाँत का भेदभाव समाप्त होगा।
लहु कैसे लहु को पुकारेगा ?
वो तो ठंडा पड़ा होगा।
मशीनें ,करती काम होंगी ,
मशीनी हर मानव होगा।
महिला घूमती सरेआम होगीं ।
महिला का तब न ,इतना सम्मान होगा ,
वो घर की नारी न रहकर......
बराबर की साथी बन ,उसका इस्तेमाल सरेआम होगा।
भावनाओं जज़्बातों से ,न किसी का सरोकार होगा।
न बड़ों का सम्मान होगा ,स्वार्थी हर इंसान होगा।
पैसा होने पर भी ,इंसान पैसे का लालची होगा।
उस वक़्त भी ,कुछ लोग ,लोगों को......
जागरूक तो करते होंगे ,वे भी बस एक मिसाल होंगे।
