इश्क़ एक ग़ुनाह है ,जो हर किसी से हो जाता है।
ये ग़ुनाह हर कोई करना चाहता है।
माना कि ,ये दिल को दिल से जोड़ता है ,
ये ग़ुनाह ! वो करता नहीं ,हो जाता है।
ग़ैर को अपना समझ ,जब दिल उससे जोड़ता है।
सबसे बड़ा कुसूर ,तो इस दिल का होता है
कहीं देखी नहीं कोई अच्छी सुरत ,ग़ुनाह कर बैठता है।
आँखे मयख़ाना बन जाती हैं।
जब उनसे जाम पीकर, एक कुसूर हो जाता है।
ये रुलाता है ,रात -दिन बेचैन करता है ,
कुसूर रूह का हो जाता है ,जब रुबायत ए इश्क़ लिखा जाता है।
इश्क़ वो गुनाह है ,जो वो करे दे ,थोड़ा है।
इस इश्क़ के चक्कर में ,न जाने कितने गुनाह कर जाता है ?
