दोस्तों की यादें ,कैसे भुला दें ?
एक रबर -पेंसिल के लिए ,
दोस्त बन जाते।
छोटी सी ही बात पर ,
'कुट्टी 'भी कर जाते।
स्कूल के दोस्त ,स्कूल की दोस्ती ,
कुछ खेल अब भी ,स्मरण हो आते हैं।
स्टापू ,गिट्ठू ,तोता और मैना उड़ाना।
पहेली पूछ ,दूसरों को सताना।
उत्तर न दे पाने पर ,मन ही मन प्रसन्न होना।
घर में तो ,मैं अपनी 'फ़ेवरेट ''आप बन गयी।
बुआ के दुपट्टे को ओढ़ ,आईने में ,
स्वयं को निहार, इठलाना।
अपने आप ही ,कभी परी ,
कभी राजकुमारी बनना।
आपने आप से ही शिकायत ,
अपने -आप को ही मनाना।
माँ के शृंगार से ,सजना -संवरना ,
तौलिये के बनाये ,भाई संग खेलना।
अपने काल्पनिक दोस्तों संग रहना।
बचपन के खेल -खिलौने बचपन में ही रह गए।
दोस्त तो न जाने कहाँ गए ?
बचपन की यादें आईं ,तो दोस्त भी आ गए।
