Main apni fevret ban gyi

 दोस्तों की यादें ,कैसे भुला दें ?
एक रबर -पेंसिल के लिए ,
दोस्त बन जाते। 
छोटी सी ही बात पर ,
'कुट्टी 'भी कर जाते।
स्कूल के दोस्त ,स्कूल की दोस्ती ,
स्कूल  तक ही  रही ।
कुछ खेल अब भी ,स्मरण हो आते हैं। 
स्टापू ,गिट्ठू ,तोता और मैना उड़ाना। 
पहेली पूछ ,दूसरों को सताना।
उत्तर न दे पाने पर ,मन ही मन प्रसन्न होना।  
घर  में तो ,मैं अपनी 'फ़ेवरेट ''आप बन गयी।
बुआ के दुपट्टे को ओढ़ ,आईने में ,
स्वयं को निहार, इठलाना।
अपने आप ही ,कभी परी ,
कभी राजकुमारी बनना। 
आपने आप से ही शिकायत ,
अपने -आप को ही मनाना। 
माँ के शृंगार से ,सजना -संवरना ,
तौलिये के बनाये ,भाई संग खेलना। 
अपने काल्पनिक दोस्तों संग रहना। 
बचपन के खेल -खिलौने बचपन में ही रह गए। 
दोस्त तो न जाने कहाँ गए  ?
बचपन की यादें आईं ,तो दोस्त भी आ गए।   
laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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