Barsat ki wo raat [part 14]

अभी तक आपने पढ़ा -अब शैलेश प्रसन्न रहने लगा है ,क्योकि उसकी रुहाना स्वयं ही उससे मिलने आ जाती है। उसकी माँ ,कविता को लग रहा था ,कि ये उसकी नज़र उतारने का परिणाम है। उधर नंदिनी ,तुषार की बातों और उसके व्यवहार से ,उसकी ओर आकर्षित हुई। जब  से ये घटनाओं का सिलसिला आरम्भ हुआ नंदिनी को तुषार की चिंता सताने लगी। पंडित जी ने भी ,शैलेश के लिए एक लड़की ,तलाश कर ली है। अब सब कुछ ठीक है -'ऐसा कविता का सोचना है ,'' अब आगे - 

माँ ने कहा - आज तू अपने क्लीनिक मत जा ,आज हम तेरे लिए ,लड़की देखने जा रहे हैं ,कल मुझे पंडितजी ने बताया। 


मैं जाकर क्या करूंगा ?आप लोग ही देख आइये। 

विवाह तेरा है कि मेरा ,कविता ने प्रश्न किया। 

अब तो भाई देखने जायेंगे नहीं ,और जब हम पसंद कर आएंगे तब उसमें ,नहीं....  हमारी पसंद में कमी निकालेंगे ,नंदिनी ने उसे चिढ़ाते हुए कहा। 

तू कुछ ज्यादा ही बोलने लगी है ,अब अपने हॉस्टल कब जा रही है ?शैलेश बोला। वो अब रुहाना से मिलने के पश्चात ,अन्य किसी भी लड़की से मिलना नहीं चाहता था। किन्तु अभी घरवालों को उसके विषय में बता भी नहीं सकता था क्योंकि वो न ही उसके घर -परिवार के विषय में कुछ जानता है और न ही ,वो ये जानता है -वो भी उससे विवाह की इच्छुक है या नहीं। पहले दिन तो ,उसे ये सब सपना लगा था किन्तु अब तो वो उसी खिड़की से प्रतिदिन आने लगी थी। माँ की इच्छानुसार ,वो उनके साथ जाने के लिए तैयार हो गया। 

लड़की वालों ने काफी अच्छा इंतजाम किया था ,लड़की भी देखने में बहुत सुंदर थी किन्तु रुहाना से मिलने के पश्चात ,उसे कोई अच्छा नहीं लग रहा था ,पता नहीं ,उसकी निगाहों में कौन सा जादू था ?वो शांत बैठा रहा। कविता और नंदिनी ने लड़की को देखते ही पसंद कर लिया। उस लड़की ने भी शैलेश को पसंद कर लिया। माँ तो अपने हाथों  के कड़े देकर ,बात पक्की कर आई। 

शैलेश  खोया सा था ,वो समझ नहीं पा रहा था कि क्या कहे ?उसने आज निश्चय किया आज वो उससे बात कर लेगा। रात्रि में जब ,सब सो जाते हैं ,रुहाना  उसके करीब आती  है। उसे देखते ही वो खिल उठता है। आज वो उससे सब बात कर लेगा।

 वो कुछ कहता ,उससे पहले ही ,रुहाना पूछती है -लड़की पसंद आ गयी। 

शैलेश हतप्रभ सा ,उसकी तरफ देखता रह जाता है ,वो समझ नहीं पाता कि क्या कहे ?तभी वो खिलखिलाकर हंसती है और पूछती है -क्या वो मुझसे भी हसीन है ?कहकर उसकी आँखों में झाँकते हुए फिर से हंसने लगती है।

 उस समय ,नंदिनी की अचानक से आँखें खुल गयीं। उसने वो खनकदार हंसी सुनी और सोचा -इस समय कौन हँस रहा होगा ?वो अंदाजा लगाती है कि ये आवाज किधर से आ रही है ,तभी उसे लोगों के खून पीने वाले ,जानवर या पिशाचिनी का उसे स्मरण हो आया और वो दबे क़दमों से बाहर आई। ये आवाज तो भाई के कमरे से आ रही है किन्तु अब नहीं आ रही थी। शायद उसे भ्र्म हुआ हो, वो वापस चल दी।बाहर  कुत्ते भी बहुत भौंक रहे थे , तब नंदिनी ने बाहर देखा। उसे कुछ भी ऐसा नहीं लगा। जैसे ही वो मुड़ी तभी उसे किसी के होने का एहसास हुआ और उसने किसी को भाई की खिड़की के समीप चलते देखा। दूर से तो वो कोई स्त्री ही लग रही थी ,किन्तु तब नंदिनी डर गयी कि कहीं  ये वही खून पीनेवाली पिशाचिनी तो नहीं। वो दौड़कर अपने कमरे में गयी और कमरे की कुंडी लगा ली।

प्रातः काल उठते ही ,उसने सबसे पहले ,समाचार पत्र उठाया और कोई  ऐसी खबर देखने लगी जो उनके घर के आस -पास घटी हो, जिसमें किसी की  कल रात्रि को भी ,खून चूसने से हत्या हुई हो। 

आज सुबह -सुबह ,कैसे समाचार -पत्र पढ़ने लगी ?शैलेश ने पूछा। तू तो ,समाचार -पत्र किसी आवश्यक कार्य से ही देखती है। आवश्यक कार्य ही तो है ,तभी तो देख रही हूँ। 

क्या तेरी परीक्षा का परिणाम आया है ?

क्या बात कर रहे हो  ? भाई ! मेरा परीक्षा परिणाम कब का आ चुका ?परन्तु आप एक बात बताइये -रात्रि में आपके साथ कमरे में कौन थी ?

नंदिनी के इस प्रश्न  से ,एकाएक शैलेश परेशान हो गया और बोला - भला मेरे कमरे में कौन हो सकता हैं  ?कुछ भी न बोलती रहती है। 

मैं कुछ भी नहीं बोल रही हूँ ,मुझे रात्रि में आपके कमरे से ,किसी लड़की के हंसने की आवाज़ आ रही थी।जब मैं दरवाजा खटखटाने वाली थी ,तब एकदम शांति हो गयी। तब मैंने आपके कमरे  की खिड़की से किसी को उतरते हुए देखा और  वो ऐसे ही नहीं उतर  रही थी वरन दीवार पर चल रही थी। 

तेरा तो दिमाग़ ख़राब हो गया है ,कुछ भी बोलती रहती है। रात्रि में सपना देख रही होगी। तू ये बता !तुझे इतनी रात्रि में ,कैसे पता चला  ?कि वो कोई महिला या पुरुष है। 


इतना मैं समझती हूँ। दूर से भी अंदाजा लग जाता है कि वो किसी पुरुष की परछाई है या स्त्री की। 

कविता जो इतनी देरी से ,उन दोनों की बातें सुन रही थी,बोली -वो तेरा वहम भी तो हो सकता है। तेरे भाई के कमरे की खिड़की कितनी ऊंचाई पर है ?कोई चोरी -छिपे आती भी है, तो उसे दरवाज़े से ही आना होगा।

नहीं ,मम्मी मैंने उसे दीवार पर चलते देखा है ,मुझे तो लगता है -ये वही पिशाचिनी होगी ,जो रात्रि में घूम रही होगी या फिर शिकार की तलाश में निकली होगी। भाई की खिड़की खुली देखी  होगी ,तो उनसे मिलने जा रही होगी किन्तु उसने मुझे देख लिया ,इसीलिए भाई को छोड़ दिया होगा। 

हाँ इसलिए ,उसने सोचा होगा ,इसकी बहन ही इसका इतना खून चूस जाती है ,अब मुझे क्या मिलेगा ? 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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