Kiski dulhan [part 61]

रात्रि  के दो बजकर सात मिनट हो चुके थे ,हवेली के ऊपरी हिस्से में पसरा सन्नाटा अब पहले जैसा नहीं था।कमरे की खिड़की के बाहर हवा चल रही थी। पर्दे बार-बार दीवार से टकरा रहे थे। मेज पर रखी पीतल की छोटी चाबी के ऊपर पीली रोशनी पड़ रही थी। उसके किनारे पर उभरे तीन अक्षर—M.B.R.—अब साफ दिखाई दे रहे थे।

भानु की साँसें अभी भी तेज थीं ,उसने अपनी आँखें बंद कीं तो वही दृश्य फिर से उभर आया -बारिश ! एक बंद कमरा ! किसी बच्चे के रोने की आवाज़ और एक आदमी की कठोर चेतावनी—“भानु, अगर तुमने उसे बचाया… तो तुम दोनों में से कोई भी उसे दोबारा नहीं देख पाएगा।”भानु  ने अचानक अपनी आँखें खोल दीं।उसके सामने मोहिनी बैठी थी ,भानु के आँखें खोलते ही बोली -भानु ! उसने कोई जवाब नहीं दिया।


“भानु, मेरी तरफ देखो !”इस बार उसने धीरे से उसकी ओर देखा।मोहिनी के चेहरे पर डर था, लेकिन वह खुद को संभालने की कोशिश कर रही थी। क्या तुम्हें कुछ याद आया है ?”

भानु ने ,कुछ पल तक उसे देखा फिर धीमे स्वर में बोला, “एक कमरा… बारिश… और एक बच्चा !”

“कौन-सा बच्चा,क्या तुमने उसे देखा है ?”

“मुझे नहीं पता,मैंने उसका चेहरा भी नहीं देखा। ”

“भानु , तुमने अभी मेरा नाम लिया था। तुमने कहा था,' कि किसी ने हमें अलग किया था।'

भानु ने अपना माथा दबाते हुए कहा -“मुझे बस इतना याद है, कि कोई मुझे ,तुम्हारे पास जाने से रोक रहा था, शायद' मैं' तुम्हें बचाना चाहता था।”मोहिनी  की आँखें नम हो गईं और तुम मुझे बचा नहीं पाए?”

भानु ने उसकी ओर हाथ बढ़ाया, लेकिन बीच में ही रुक गया ,“मुझे नहीं पता कि उस रात क्या हुआ था ? मैं तुम्हें झूठी उम्मीद नहीं देना चाहता।”

मोहिनी ने उसका हाथ पकड़ लिया और बोली - मैं, तुमसे पूरी कहानी अभी नहीं पूछ रही, बस इतना जानना चाहती हूँ कि उस रात तुम मेरे साथ थे या नहीं।”

भानु ने उसकी उँगलियों को कसकर थाम लिया ,“हाँ मुझे लगता है, कि मैं वहाँ था।”

“और तीसरा बच्चा?

भानु  की आँखों में एक क्षण के लिए बेचैनी उभरी ,शायद वह भी ,दोनों कुछ देर तक चुप बैठे रहे।फिर मोहिनी ने मेज पर रखी चाबी उठा ली। इस पर M.B.R. लिखा है,यानि मोहिनी , भानु … और R”

“या फिर किसी और नाम के तीन अक्षर,” भानु ने कहा।

“तुम्हें लगता है, कि R का मतलब राजवीर हो सकता है ?”

“मुझे नहीं पता लेकिन अगर यह निशान 2001 से जुड़ा है, तो हमें यह पता लगाना होगा कि इसे किसने बनाया था ?”

मोहिनी ने चाबी को अपनी हथेली में बंद कर लिया और यह भी कि यह पहले M क्यों दिखा रही थी ?”

भानु ने चाबी को ध्यान से देखा और बोला -“हो सकता है, कि वह M कभी था ही नहीं, रोशनी और खरोंचों की वजह से अक्षर अलग दिखाई दिया हो।”

मोहिनी ने उसकी ओर देखा और बोली -“तब हमें, इसे किसी ऐसे व्यक्ति को दिखाना होगा, जो पुरानी चीजों के निशान पहचान सके।”

“रणवीर ?”

“नहीं, इस बार किसी ऐसे व्यक्ति को, जिसका इस परिवार से कोई संबंध ही न हो।”

भानु ने सहमति में सिर हिलाया ,उसी समय दरवाजे पर तीन बार दस्तक हुई ,दोनों चौंक गए।“कौन?” भानु ने पूछा।

बाहर से रणवीर की आवाज आई -“मैं हूँ , और इस बार बिना किसी रहस्यमयी लिफाफे के आया हूँ।”

भानु ने दरवाजा खोला,रणवीर के हाथ में एक पुरानी फाइल थी।इस समय उसके चेहरे पर सामान्य मजाकिया भाव नहीं थे। उन्हें देखकर बोला - तुम दोनों अभी तक जाग रहे हो, यह देखकर अच्छा लगा।   “क्योंकि मुझे अभी कुछ ऐसा मिला है, जो शायद तुम्हारी रात को और खराब कर देगा।”

मोहिनी ने फाइल की तरफ देखा और पूछा - इसमें क्या है ?”

रणवीर कमरे के अंदर आया और फाइल मेज पर रख दी और बोला -“ये पुराने कर्मचारियों का रजिस्टर है , हवेली में 2001 के दौरान काम करने वाले लोगों की सूची।”

भानु ने भौंहें सिकोड़ते हुए पूछा - तुम्हें यह कहाँ से मिला?”

“पुराने दफ्तर में  वहाँ की अलमारी में एक नकली ताला लगा था, असली चाबी उसके पीछे चिपकी हुई थी।”

“और तुम्हें कैसे पता चला ?कि वहाँ कोई रजिस्टर छिपा है, मोहिनी ने पूछा।

रणवीर ने उसकी ओर देखा ,क्योंकि किसी ने उस अलमारी को बाकी अन्य सभी अलमारियों से अलग तरीके से साफ करवाया था। धूल सिर्फ उसी जगह से हटाई गई थी।”रणवीर ने फाइल खोल दी ,अंदर कुछ पुराने कागज थे। कुछ नाम धुंधले हो चुके थे, कुछ पर स्याही फैली हुई थी।तब रणवीर ने एक पन्ने पर उँगली रखी -“यह देखो !  17 अगस्त 2001 की रात की ड्यूटी।”

मोहिनी आगे झुकी ,उसने उसे पढ़ा और देखा ,सूची में कई नाम थे।रसोई के कर्मचारी ,सुरक्षा गार्ड ,माली, और सबसे नीचे एक नाम, जिसे काली स्याही से काट दिया गया था।“माधव वर्मा ”उस नाम को पढ़ते ही मोहिनी का चेहरा अचानक बदल गया ,उसने वो नाम बुदबुदाया “माधव…”

भानु ने उसकी ओर देखा ,“क्या हुआ?”

“यह नाम मैंने पहले कहीं सुना है।”

“कहाँ ?”

मोहिनी ने आँखें बंद कर लीं, कुछ क्षण तक वह अपनी स्मृति में उस नाम को खोजती रही ,तब बोली -मुझे ठीक से याद नहीं है, लेकिन किसी ने बचपन में मुझे इस नाम से डराया था।”

रणवीर ने तुरंत पूछा, “किसने?”

“वो ही तो याद नहीं आ रहा ।”

भानु ने रजिस्टर अपने हाथ में ले लिया ,देखें तो सही ,इसके आगे क्या लिखा है?”

रणवीर ने पन्ना पलटा ,अगले पन्ने पर उसी नाम के सामने एक टिप्पणी थी—‘रात्रि ड्यूटी से अनुपस्थित। अगले दिन से सेवा समाप्त।’उसके नीचे लाल पेंसिल से एक और वाक्य लिखा था—‘व्यक्ति को परिसर से बाहर नहीं जाने देना है।’कमरे में सन्नाटा छा गया।

मोहिनी ने धीमे स्वर में पूछा- “अगर उसे नौकरी से निकाल दिया गया था, तो उसे बाहर जाने से रोकने का आदेश क्यों दिया गया ?”

रणवीर ने कहा, “यही तो सवाल है।”भानु ने पन्ने को ध्यान से देखा ,देखें तो सही “यह आदेश किसने लिखा?”रणवीर ने नीचे बने हस्ताक्षर दिखाए ,नाम स्पष्ट नहीं है, सिर्फ एक अक्षर बचा है—R।”

मोहिनी ने तुरंत चाबी की ओर देखा। M.B.R.वही R लेकिन क्या यह सचमुच एक ही व्यक्ति हो सकता है ?या किसी ने जानबूझकर दोनों जगह एक जैसा अक्षर बनाया था?

सुबह 6 .30 बजे - हवेली के आँगन में हल्की धूप उतर चुकी थी।मोहिनी पूरी रात नहीं सोई थी, भानु ने भी आँखें नहीं मूँदी थीं ,वो भी उसके साथ रातभर जगा रहा। 

रणवीर रजिस्टर लेकर अपने कमरे में चला गया था। उसने कहा था -कि वह बाकी पन्नों की जाँच करेगा और किसी से इस बारे में बात नहीं करेगा।'

लेकिन मोहिनी के मन में एक ही नाम घूम रहा था—माधव वर्मा !वह अपने कमरे की खिड़की के पास आकर खड़ी हो गयी ,कुछ देर पश्चात दरवाजे पर धीमी दस्तक हुई ,“अंदर आ सकती हूँ?” एक महिला की आवाज आई।

मोहिनी ने दरवाजा खोला ,सामने कमला खड़ी थी,“क्या हुआ ?कमला !” मोहिनी ने पूछा।कमला ने पहले गलियारे में देखा, फिर एकदम से कमरे में प्रवेश किया और धीमे स्वर में बोली -“मुझे आपसे अकेले में कुछ कहना है।”

मोहिनी,उसका इशारा समझकर उसे अंदर बुलाया और मोहिनी ने दरवाजा बंद कर दिया -“कहो !”


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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