Zeenat [part 70]

जब सुदीप ने घर आकर भूमि को बताया कि ज़ीनत की असलियत क्या है ? भूमि को तो विश्वास ही नहीं हो रहा था। ये लड़की इतना कुछ भुगत चुकी है किन्तु सबसे बड़ी बात तो ये है। उसने मुझे अपने विषय में जो भी बातें बताई , वो एक -एक अक्षरशः  बेबुनियाद और झूठी थीं। माना  कि उसके जीवन की भी एक कहानी थी, किन्तु वो तो गलत ही थी,जो उसने मुझे सुनाई।  उसका वो अपने शौहर को याद करना, अपनी ससुराल के विषय में बताना। अपने दो बच्चों का होना, जबकि वो उसकी बहन के बच्चे थे। क्या वो सब उसकी कल्पना थी। यदि वो इतनी कल्पना कर सकती है तो वो 'पगली 'कैसे हुई ?

एक दिन भूमि ने, उससे खड़े होकर ठीक से झाड़ू लगाने के लिए कहा था। 


तब वो बोली -मैं झुककर झाड़ू नहीं लगा सकती ,मेरी कमर में दर्द हो जाता है। जबसे मेरे बच्चे हुए हैं परेशानी आ गयी है। वो सब क्या था ?

 भूमि ने एक बार उसे बतलाया था - कि मुझे एक कहानी लिखनी है और मैं सोच भी रही थी -कि मैं अब तुम्हारे जीवन पर एक कहानी लिखूंगी। गरीब की मनोदशा ,गरीब की स्थिति , कैसे एक गरीब परेशानियों से जूझता है ? किंतु वह तो भूमि को ही एक बड़ी कहानी सुना गई, जो उसके लिए अचम्भित कर देने वाला  था। भूमि को अभी भी रह-रहकर  विश्वास नहीं हो रहा था ,वो इतनी  बड़ी झूठी कहानी कैसे बना सकती है ? लोग तो उसे ' पगली 'कहते हैं। क्या कोई 'पागल 'कम दिमाग़ ऐसी कहानी रच सकता है ? 

यही बात उसने सुदीप से कही और बार-बार, उससे यही कहे जा रहे थी। 

तब सुदीप ने कहा -वो इतनी भी' पागल' नहीं थी ,जो अपने ही कपड़े फाड़े। उसने तुम्हें और तुम्हारे व्यवहार को देखकर ऐसी कहानी सुनाई ,जिससे तुम उसकी बातों को ज्यादा से ज़्यादा सुन सको ! उस पर ध्यान दो ! तुमने उससे कहा -तुम्हें उस पर एक कहानी लिखनी है ,उसने तुम्हें कहानी दे दी, कहकर मुस्कुराये।

किन्तु मैं उसके वास्तविक जीवन को लिखना चाहती थी। 

जब तुम्हें, पता चलता ,वो धंधा करती थी ,वो बीमारी पाले हुए है। क्या तुम ,उसे अपने घर में पनाह देतीं ? वो 'पगली' दिखती है किन्तु उसकी सोचने -समझने की ,शक्ति क्षीण नहीं हुई है। वो लोगों को अपनी  कहानी सुनाती है ,जो लोग सुनना चाहते हैं। जिससे लोगों में उसके प्रति, सहानुभूति पैदा हो।  मैंने , तुमसे कितनी बार कहा था,' इससे ज्यादा बात मत करो ! किंतु तुम्हें तो मेरी बातों पर नहीं उसकी बातों पर ज्यादा विश्वास था। तुम्हारा उस औरत को घर में घुसाना ही गलत था। वह तो अच्छा हुआ, हमारा कुछ अहित नहीं हुआ।

ए !!! चल उठ, खड़ी हो ! बहुत आराम हो गया। हमने पता लगाया है ,वो घर तेरा नहीं ,तेरी बहन का ही है ,मनोरमा ने उससे कहा। 

मनोरमा के इस तरह के व्यवहार से वो अचानक घबराई सी उठी और इधर -उधर देखने लगी। तब बोली -मैं सही कह रही हूँ। मेरे अम्मी -अब्बू ने मेरे ही नाम किया था। वो घर मेरा ही है ,मैं पहले वहीँ रहती थी ,उस आदमी ने भी मुझे देखा था। तभी तो उसने मेरी गवाही दी। तुम मेरी बहन से पूछ लो !

तेरी बहन से ही पूछना चाहते थे किन्तु वो तो मर चुकी है। शायद पुलिसवालों के दिल नहीं होता किन्तु मनोरमा के तो कतई नहीं था। इस काम में दिल का कोई काम नहीं ,और मनोरमा अपना काम ही कर रही थी।  उसकी बात सुनते ही ,ज़ीनत एकदम से उठी और मनोरमा की तरफ झपटी और चिल्लाकर बोली - तू झूठ बोल रही है ,मेरी बहन जिन्दा है। 

मनोरमा घबराकर पीछे हटी और एक जोरदार थप्पड़ उसके मुँह पर लगाया और बोली -मैं भला क्यों झूठ बोलूंगी ? तेरे जीजा ने ही हमें बताया -' वो तीन साल पहले मर चुकी है। ऐसा है ,तुझे मैडम ने बहुत सिर चढ़ाया है किन्तु मैं ऐसी नहीं ,तूने अभी जो हरक़त की ,आगे करने की सोचना भी मत करना ! वरना  तुझे जिंदा नहीं छोडूंगी ,समझी ! अब बता ! तू जब यहाँ आई थी ? क्या अपनी बहन से नहीं मिली थी ? 

थप्पड़ खाकर ज़ीनत चुपचाप नीचे बैठ गयी, कुछ देर तक बैठी हुई मनोरमा की बातें सुनती रही ,तब बोली -उसने मुझे भगा दिया था ,इसीलिए मेरे जीजा ने ही उसे मारा होगा। वो मेरे पीछे पड़ा था ,जब वो मेरे पास होता था तब मेरी बहन को बड़ा दुःख होता था। 

हमने आस -पास भी पूछा ,किसी को कुछ पता नहीं है ,सब यही कह रहे हैं -वो बहुत दिनों से बिमार थी। 

नहीं, मेरी बहन बिमार नहीं थी। वो साला, कमीना ,मेरा बहनोई , उसने मेरे भागने पर, उसे मारा होगा ,अचानक ही फिर से उसका व्यवहार बदल गया। इस समय देखने से वो बहुत डरावनी लग रही थी। उसके चेहरे को देखकर मनोरमा भी घबरा गयी ,उसे लगा कहीं ये मुझ पर फिर से हमला न कर दे ! किन्तु हिम्मत करते हुए बोली - चुपचाप बैठ जा ! मैडम आने ही वाली हैं। यदि तेरे जीजा ने उसे मारा है तो हम पता लगा लेंगे। 

तुम  कुछ भी पता नहीं लगा पाओगी ,एकाएक बोली -उसने मेरे साथ ग़लत किया, उसे भी सजा मिल गई। 

किसने तेरे जीजा ने..... 

नहीं ,मेरी बहन ने ,उसने ही तो मुझे आसिफ़ को बेचा था। 

बेचा था ,कल तो ये बात तूने तो हमें नहीं बताई । 

आज याद आया ,आसिफ़ ने कहा था ,'मेरी बहन ने उससे पैसे लिए थे ,तभी तो उसने, मुझसे' निक़ाह' नहीं किया, मुझसे पैसे कमाए। एकाएक हंसने लगी और बोली -अब तो मैं मुफ़्त में ही भलाई करती हूँ ,कोई नहीं बचेगा सब मर जायेंगे। 

ए ! चुपचाप बैठ ! पहले ये बता ! तू ये सब क्यों कर रही थी ? क्या सबको बीमार करना चाहती है ? 

हाँ ,किसी को भी मुझसे कोई हमदर्दी नहीं ,मैं बिमार थी ,भूखी थी , किसी को मुझ पर रहम नहीं आया जिसने मेरी मदद की भी, तो बदले में मेरा ये बीमार शरीर माँगा। मैं मरूंगी ही  औरों को भी साथ लेकर जाउंगी। 

क्या तुझे आसिफ़ ने भेजा है ? बाहर से आते हुए इंस्पेक्टर कविता ने पूछा। 

नहीं ,उसने तो मुझे भगा दिया ,कहते हुए उसके शब्दों में दर्द छलक आया। अब मुझे मिल गया तो, उसे भी मार दूंगी ,न जाने कितना गुस्सा,अपने मन में भरे बैठी थी ? 

अच्छा, ये बता ! किस -किससे तूने संबध बनाये ? उनका नाम, पता कुछ है , ऐसा लग रहा था जैसे सोच रही है ,मनोरमा और कविता उसके जबाब के इंतज़ार में थीं। जब कुछ देर तक वो बोली नहीं ,तब मनोरमा बोली -क्या हुआ ? चुप क्यों है ?

उनसे मैंने नहीं कहा था ,आओ !मेरे साथ सो ! मैंने उनके किये एक -एक एहसान की क़ीमत चुकाई  है ,उसके शब्दों में कड़वाहट भरी थी। किसी ने एक टुकड़ा भी दिया तो उसके बदले में मेरा ये शरीर नोचा। मैं कई दिनों तक नहाती नहीं थी ,मुझे अपने अंदर ख़ुद बदबू आती, तब भी वे मुझे नोचने को तैयार रहते।

 तूने, उन्हें बताया नहीं , मुझे बिमारी है। 


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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