Khoobsurat [part 17]

आज अचानक ही ,कुमार नित्या के कॉलिज में आ जाता है और उसका प्रशंसक बनकर, उससे बातचीत आरम्भ करता है ,तब वो नित्या से पूछता है -अब आपने आगे बढ़ने का क्या सोचा है ?

नित्या, उसके प्रश्न को ठीक से समझ ही नहीं पाई ,तब उसने कुमार से पूछा -मतलब !

 मेरा मतलब है , पेंटिंग को ही अपना करियर बनाएंगी ,इसी  में आगे बढ़ेंगी या फिर कोई नौकरी करेंगी आप तो दो राहों पर चल रहीं हैं, किस राह पर आगे बढ़ना चाहेंगी ? क्या अपने शौक़ के साथ ही आगे बढ़ना चाहेंगी। 


ओह ! वह तो कुछ और ही सोच बैठी थी,तब वो बोली -अभी मैंने ज्यादा कुछ सोचा नहीं है ,अब तक नित्या  सामान्य हो चुकी थी। देखते हैं ,जिस राह भी मंज़िल मिलती नजर आएगी, उसी राह आगे बढ़ते चले जायेंगे। 

क्या आप अपने शौक को ,अपनी कला को दबा देंगीं ?

ऐसा मैंने, कब कहा ?हो सकता है ,इसी में आगे बढूं। 

वैसे आपको अपनी कला के लिए इतना समय मिल जाता है ,पढ़ाई के साथ -साथ ,आपको अपनी कला के अभ्यास के लिए भी  समय  मिल जाता है। 

हाँ ,हाँ एक घंटा इसके लिए निकाल ही लेती हूँ। 

मात्र एक घंटे में ,इतनी अच्छी कलाकारी ! आश्चर्य से वो बोला - 

उसके हाव -भाव देखकर नित्या को लगा, जैसे उसने कुछ गलत तो नहीं बोल दिया ,उसे लगा, ये कुछ ज्यादा ही जानकारी ले रहा है ,मुँह से ,कहीं कुछ गलत न निकल जाये ,तब वो बोली -अब हमें चलना चाहिए ,उस कैंटीन वाले के पैसे भी तो देने हैं। 

इसकी कोई आवश्यकता नहीं है ,मैंने उसका पेमेंट दे दिया है। 

तब वो बोली -मुझे अपनी  क्लास में भी जाना है, क्या तुम्हारी कोई क्लास नहीं है ? 

नहीं ,आप मुझे भगाना चाहती हैं ,वैसे 'आपके लिए तो हम क्लास भी छोड़ सकते हैं ,'ये उसने कुछ इस अंदाज़ में कहा ,नित्या को अच्छा लगा और सोचने लगी। ये 'तमन्ना' का बहुत अच्छा प्रशंसक है।क्या सोच रहीं हैं ? कुछ देर और बैठिये !आप इतनी अच्छी छात्रा हैं ,एक दिन लेक्चर नहीं भी लेंगी तो चलेगा। 

तुम्हें कैसे पता चला ? मैं इतनी अच्छी छात्रा हूँ। 

आपके कॉलिज की ही किसी लड़की ने बताया था। 

क्या आप मेरे विषय में तहक़ीक़ात कर रहे थे ?

भला ,मैं क्यों तहक़ीकात करूंगा ? वो तो मैंने यहाँ आकर तमन्ना के विषय में पूछा ,वैसे आपको ''तमन्ना'' के रूप में यहाँ कोई नहीं जानता ,क्या यहां किसी को भी, आपके इस हुनर की जानकारी नहीं है ?आपके कॉलिज वालों को भी तो आप पर फ़क्र होना चाहिए था ,उनके कॉलिज की छात्रा इतनी अच्छी पेंटर होने के साथ -साथ ,कई प्रतियोगिताएं जीत चुकी है।आख़िर आप इस तरह अपने को क्यों छुपाये रखना चाहती हैं ?किसी दूसरे नाम से ये सब क्यों ?कोई भी कलाकार होगा ,उसकी कला ,उसकी प्रतिभा खिले पुष्प की तरह अपनी खुशबू बिखेरती ही है, किन्तु मुझे लगता है ,आप अपनी प्रतिभा को कुछ लोगों से सामने ही लातीं हैं और जिन्हें आपकी प्रतिभा के विषय में जानकारी है ,उन्हें आपके विषय में कोई जानकारी नहीं ,ऐसा क्यों ?

उसके प्रश्नों से नित्या' बगलें झाँकने लगी ',  मन ही मन सोच रही थी ,यदि ये प्रतिभा मुझमें होती तो ,मैं तो सबके सामने आकर बताती, ये कलाकृति मैंने बनाई है, किन्तु क्या करूं ? ये हुनर तो जिसके पास है ,वो अपने आपको छुपाती है ,लोग उसे देखकर ,उसकी कलाकृति से ज़्यादा उसकी अवहेलना करते हैं , भगवान का भी न जाने, ये कैसा न्याय है ? जिसको कला दी है , उसे रूप नहीं दिया और जिसे रूप दिया है ,उसे कला नहीं दी किन्तु  चाहने वाला तो सभी चीजें चाहता है। ऐसा नहीं है ,कि इस संसार में ये दोनों ही चीजें किसी के भी पास नहीं हैं  वे लोग तो बड़े ही भाग्यशाली होंगे जिन्हे दोनों चीजें मिली हैं।

क्या सोच रहीं हैं ?कुमार ने पूछा। 

कुछ नहीं ,अभी मैं सबके सामने आना नहीं चाहती,उस प्रतियोगिता में भी ,उस समय उन लोगों की शर्त के कारण ही सामने आई थी किन्तु अभी इतनी भी प्रसिद्ध नहीं हुई हूँ ,जो मुझे हर कोई जानने लगेगा। मुझे नहीं लगता अभी मैं उस मुक़ाम पर हूँ किन्तु जब हो जाउंगी तो मुझे किसी से कहने की कोई  आवश्यकता नहीं होगी। सूरज और चाँद को अपने विषय में बताना नहीं पड़ता ,उनकी चमक स्वयं ही, उनका एहसास करा देती है। 

हँसते हुए ,कुमार बोला -आप तो बोलती भी, बहुत अच्छा हैं। ख़ैर छोड़िये !अभी मैं चलता हूँ ,आपसे फिर कब मुलाकात होगी ?नित्या, इससे पहले कि कुछ कहती ,कुमार ने उससे उसका नंबर मांग लिया और बोला - मैं फोन करूंगा, उठा लीजियेगा ,कहते हुए वहां से निकल गया। 

नित्या उसे जाते हुए देख रही थी ,कमाल है !मुझसे रुकने के लिए कहा और फिर स्वयं ही चला गया किन्तु मैं भी रुकी  ही क्यों थी ?मुझे जाना था तो चले जाना चाहिए था। अपनी क्लास में जाते समय भी, उसका ही ख़्याल आ रहा था , क्या वो मेरे जबाब से संतुष्ट हुआ होगा ,क्या वो मुझे फोन करेगा ? शिल्पा बता  रही थी -वो  उसी की कला की तरह,  सुंदर लड़की की कल्पना करता है  ,क्या मैं उसे पसंद आई ? क्या शिल्पा की कला से अथवा उसकी कल्पना से मैं, मेल खा रही हूँ ? वैसे लड़का तो जंच रहा है ,वास्तव में ही, उसके साथ सुंदर लड़की की जोड़ी ही अच्छी लगेगी ,तभी उसकी कल्पना में कुमार और वो एक साथ नजर आये। इतने विचार इतनी कल्पना, नित्या इतना सब सोच -सोचकर वह थक चुकी थी,उसने अपने सिर को थोड़ा झटका  दिया।

 कुछ देर पश्चात, फिर से उसे विचारों ने आ घेरा ,तभी मन में विचार आया ,ये सब मैं क्यों सोच रही हूँ ?वो तो तमन्ना के लिए आया था और मैं दूर -दूर तक भी 'तमन्ना' नहीं हूँ ,न ही, मुझमें उसके जैसी प्रतिभा है।तब वो मेरी तरफ क्यों खींचेगा ?

कॉलिज में ,उसी पेड के नीचे बैठी शिल्पा अपनी कलाकृति में तल्लीन थी ,वो उसमें इतनी खो चुकी थी ,उसे एहसास ही नहीं रहा कि उसके आस -पास भी कोई है ,तभी उसके कंधे पर पीछे से किसी ने हाथ रखा और वो बुरी तरह चौंक गयी , जैसे रंगों की दुनिया से खींचकर कोई उसे बाहर ले आया।

आख़िर वो हाथ किसका था ,जो उसे उस हसीन दुनिया से बाहर ले आया आइये जानने के लिए आगे बढ़ते हैं।     


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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