भइया ! थोड़ी चटनी देना !
अरे लाला ! वो रसगुल्ला दियो !
ये लो, ताऊ !
अरे दो ही दे रहा है ,चार दे !कहकर ताऊ ने उसे फटकारा।
वो ताऊ को चार रसगुल्ले देकर पूछता है ,और बताओ ताऊ! गाजर का हलवा लोगे ,या मावे की मिठाई !
अभी थम जा ,ये तो खा लूँ ,तेरा बाप कित्त गया ?
पता नहीं ,इधर -उधर ही मेहमानों की ख़ातिरदारी में लग रहे होंगे।
सुबह से उसने कुछ खाया भी है ,कि नहीं ,उसका ध्यान रख ले ,कहीं दिख जाये तो उसे बुलाकर ,पहले खाना खवा दियो ,ताऊ ने चार रसगुल्ले खाये और बोला , बस अब पेट भर गया ,अब मैं जाकर तेरे बाप को भेजता हूँ ,उसे भी कुछ खिला दियो ,अभी बुखार से उठा है ,सुबह से काम में लगा पड़ा है।
और कुछ ताऊ !
नहीं ,बस उसे भेजूं !
जी हाँ ,ये दृश्य किसी होटल का नहीं है ,ये वार्तालाप किसी वेटर के बीच का नहीं है ,बल्कि ये लोग इसी गांव के सम्मानित सदस्य हैं ,ये गांव उत्तर प्रदेश जिले में बसा है। इस गांव में आज सरपंच की बेटी ,शर्मीली की बारात आने वाली है। ये कार्य सिर्फ सरपंच का ही नहीं ,बल्कि गांव के प्रत्येक सदस्य का उत्तरदायित्व बन जाता है। ये गांव की बेटी की बारात आ रही है ,उनके मेहमान पूरे गांव के मेहमान , सभी उनके स्वागत की तैयारी में जुटे हैं। सभी ने अपने -अपने कार्य संभाल लिए हैं ,हुक्के भी गर्म हो गए हैं ,घर -घर से बिस्तरे आ रहे हैं। पानी की सुविधा ,साफ -सफाई का जिम्मा भी सबको दिया गया है। हलवाई के पास कुछ लोग बैठकर ,बातचीत भी कर रहे हैं और उनकी सहायता भी। मटर गांव की महिलाओं के लिए ,घर में छिलने के लिए पहुंच गयीं हैं।
कुछ बड़ी -बूढी ,हल्दी ,मेहँदी ,बान इत्यादि में नई बहुओं को समझा रहीं है और उन पर ताने भी कस रहीं है ,आजकल की तो कुछ भी न जाने..... ये शिकायत पुरानी पीढ़ी को हर नई पीढ़ी से रही है। कुछ बड़े बुजुर्ग ,उस समय की सरकार पर, राजनीति पर ,गांव की बहुओं पर ,नहीं -नहीं उनके आदमियों पर ,जो अब बहुओं के आने पर उनकी सुनते नहीं चर्चाएँ चल रही हैं ,रिश्तेदारियां और ख़ानदान अंगुलियों पर गिने जा रहे हैं। जो आज की पीढ़ी को अपने माता -पिता या हद से हद अपने दादा तक ही मालूम है ,उस समय सात पीढ़ियां अँगुलियों पर गिन दी जाती थीं। गांव के लड़कों ने ही स्टॉल संभाल लिए हैं ,वेटर की आवश्यकता ही नहीं ,सभी तो अपने हैं ,ताऊ,चाचा ,दादा इत्यादि गांव की बेटी का ही तो ब्याह है ,इसमें शर्म कैसी ?
कुछ लड़कियां दीदी को सजा रहीं है ,आजकल की तरह लिपा -पोती नहीं ,साधारण सी सजावट से ही उसकी रंगत निखर उठती है ,पिया मिलन की आस ,जब मन में हिलोरे लेती है ,तो सजनी स्वयं ही निखर उठती है। पूरे गांव की दावत है ,वो भी'' चूल्हेनोत ''आजकल की तरह नहीं ,दो हजार की प्लेट में चार सामान ,वो भी प्लेट गिनकर रखीं जाती हैं।
शाम को नाचती -गाती बारात आती है ,सभी उनके स्वागत में लग जाते हैं। एक -आध लड़के का किसी बिगड़ैल बाराती से झगड़ा भी जरूर होता है और बात बड़ों तक पहुंच जाती है ,क्योंकि सभी लड़कीवाले की तरफ से हैं ,बड़े -बूढ़े सुलह भी करवा देते हैं ,ये गांव की बेटी के सम्मान उसके पिता के सम्मान की बात जो है। सम्पूर्ण रात्रि पूरे गांव में चहल -पहल रहती है ,तारों की छाँव में ,अश्रुपूरित नेत्रों से लड़की को विदा करते हैं और पूरा गांव थककर सो जाता है। ये तो बस एक ही दृश्य है ,न जाने कितनी यादें बसी हैं ?वैसे ,अब ऐसे गांव चलचित्रों में ही नजर आते हैं क्योंकि अब गांव भी बदल रहे हैं।
बदल गया ,गाँव !
गांव अब ,कहीं खो गए हैं ,
रह गयीं हैं बस ,स्मृतियाँ !
अपनों के बगैर हम अकेले हो गए हैं।
खेत भी अब नहीं रहे ,
घंटी बजाते ,बैल भी अब नहीं हैं।
बुग्गी -भैंसा भी कहीं खो गए हैं।
सभी बच्चे ,कमाने बाहर गए हैं।
बस कुछ बुजुर्ग़ ही.... रह गए हैं।
गांव अब ,कहीं खो गए हैं।
कुएं बंद हो गए हैं ,ट्रैक्टर आ गए हैं।
रिश्ते और अपनापन ख़त्म हो गए हैं।
गांव अब ,कहीं खो गए हैं।
परम्पराएं और रीति -रिवाज अब पुराने हुए ,
क्या देखेंगे ? हरियाली !बटाई के पैसे आ गए हैं।
खेत अब ''फॉर्म हॉउस ''हो गए हैं।
गांव अब ,कहीं खो गए हैं।

