'' इंस्पेक्टर विकास खन्ना ''को किसी का फोन आता है ,होली पर रंग खेलने के लिए निमंत्रण दिया किन्तु इंस्पेक्टर साहब भी क्या करें ?उनकी तो मजबूरी है। होली पर उनकी छुट्टी नहीं ,ड्यूटी होती है। किन्तु करें भी क्या ?इतना सुंदर निमंत्रण, वो खोना भी नहीं चाहते। तब वो कहते हैं -मैं अपनी ड्यूटी नीलम जी की संस्था के इलाके में लगवा लूंगा ,खेल नहीं सकता तो तुम्हें खेलते हुए तो देख ही सकता हूँ।
ओ हो ! बडे ही रोमांटिक हो रहे हो ,कहते हुए ,प्रभा हंसी।
जब दोस्त इतनी सुंदर हो ,लेखिका हो ,दोनों के रास्ते नीलिमा जी की संस्था में ही जाकर मिलते हों तो क्यों न वहीं मिला जाये ? आज लेखिका संग होली खेल लेंगे ,कल को तुम हमारे संग होली खेलना।
जी नहीं ,मैं दो -दो बार होली नहीं खेल सकती।
खेलनी तो पड़ेगी ,हम भी तो आपके ही कारण अपनी ड्यूटी वहीं लगा रहे हैं। मुझे लगता है ,शायद लेखिका साहिबा का उपन्यास भी पूर्ण हो जाये।
ये आप क्या कह रहे हैं ?
जी हाँ ,हम जो भी बोलते हैं ,बहुत ही सोच -समझकर बोलते हैं ,कल के रंगों में शायद मेरी खोज और तुम्हारी कहानी पूर्ण हो जाये।
ये क्या पहेलियाँ बुझा रहे हो ?मैं कुछ समझी नहीं।
कल सब कुछ समझ जाओगी ,कल होली खेलने ,संस्था में ही आना।
ठीक है ,मैं कल आ जाऊँगी ,कहकर प्रभा फोन रख देती है ,और मन ही मन मुस्कुराती है ,इंस्पेक्टर साहब भी न.... मुझसे ज्यादा तो, वो स्वयं मेरी पुस्तक पूर्ण होने में सहायता कर रहे हैं। कल मिलते हैं ,इंस्पेक्टर साहब ! मन ही मन प्रभा ने उन्हें गुड़ नाइट किया और सो गयी।
मम्मी !आज मैं ,होली पर उन्हीं मैडम नीलिमा जी के साथ रहूंगी।
ये क्या बात हुई ?अब तुम त्यौहार में भी ,बाहर जा रही हो।
मम्मी !आज मुझे उन लोगों के साथ रंग खेलने और उन्हें क़रीब से जानने का मौक़ा मिलेगा ताकि मैं अपनी कहानी को और अच्छे से लिख सकूं।
ठीक है ,चली जाओ ! किन्तु शीघ्र ही आने का प्रयास करना।
ठीक है ,कहकर प्रभा घर से निकल गयी।
संस्था में पहुंची तो ,नीलिमा कहने लगी -प्रभा जी ,मैंने आप जैसा लेखक नहीं देखा ,जो त्यौहार में भी ,आ गयीं।
नहीं मैम ! ऐसी कोई बात नहीं ,मैंने तो कल रात्रि को फोन पर ही ,अपने आने का कारण बतला दिया था। मैं आप लोगों के साथ ये त्यौहार इसीलिए मानना चाहती हूँ ताकि आप लोगों के संग अधिक से अधिक समय तक रह सकूं और अपनी कहानी में वास्तविकता का सचित्र वर्णन कर सकूं।
ठीक है ,ठीक है ,आ जाइये !कहकर वो अपने कमरे की और बढ़ चली।
लीजिये मैम !ये क्या है ?कुछ मिठाई ,फ़ल और कांजी का पानी। मेरी मम्मी बहुत अच्छा बनाती हैं।
अच्छा ! कान्ता ये सब सामान ले जाओ !और जब मैं मंगाऊं तो ले आना।
जी ,कहकर वो सामान लेकर चली गयी। कुछ देर पश्चात ,इंस्पेक्टर साहब भी आ जाते हैं।
अरे इंस्पेक्टर साहब आप !
जी मेरी ड्यूटी आज इसी इलाके में है ,मैंने सोचा -मैडम से भी मिल लिया जाये ,और उन्हें ''होली की शुभकामनायें ''भी दे दी जाएँ ,कोई परेशानी तो नहीं।
नहीं जी ,आपके रहते हमें क्या परेशानी हो सकती है ?वैसे इन दिनों में लोग पीकर जो हुड़दंग करते हैं ,बस उनको संभालना ही मुश्किल है।
नहीं जी ,हम क्यों है ?हम भी तो इसीलिए हैं ,ताकि हमारे रहते कोई दंगा -फ़साद न हो ,इसीलिए तो त्यौहार के दिन हम लोगों की छुट्टी नहीं होती। प्रयत्न तो हमारा यही रहता है किसी को ,किसी की भी वजह से परेशानी न हो।
ये तो आप सही कह रहें हैं ,किन्तु लड़ने -झगड़ने का लोग बहाना ढूँढ ही लेते हैं। नीलिमा विकास की बातों से आश्वस्त होते हुए बोली। कांता ओ कांता...... न जाने कहाँ चली गयी ?
मैं देखता हूँ ,
आप बैठिये !यहीं कहीं होगी ,उसे भी तो होली की मस्ती चढ़ी है। बाहर होली के गानों का शोर भी बहुत है इसीलिए उसे मेरी आवाज सुनाई नहीं दी होगी।
नहीं ,मैं तो अपने हाथ धोने के लिए जाना चाहता था ,अपने हाथ दिखाते हुए विकास बोला -साथ ही कांता से भी कह दूंगा , कहकर वो उठकर बाहर चला गया।
जब विकास अंदर आया तो हाथ में ,ट्रे लेकर आया ,कुछ ठंडा था। तीनों ने ही ठंडा पिया ,नीलिमा ने बताया -आज प्रभा जी ,कांजी का पानी भी, लेकर आई हैं और मिठाई भी।
अरे वाह ! पहले क्यों नहीं बताया -'हम तो वो भी पी लेते। ''कहते हुए ,विकास ने प्रभा को मेज पर जिस थाली में गुलाल रखा था , गुलाल लगाया। जब प्रभा गुलाल लगाने के लिए आगे बढ़ी ,तब बोला -नहीं ,नहीं मेरी यूनिफॉर्म गंदी हो जाएगी , कहकर वो बाहर निकल गया ,प्रभा उसके पीछे थी ,तब प्रभा से बोला -अभी मैं एक राउंड लगाकर आता हूँ। अभी कहीं ,जाना नहीं।
प्रभा मुस्कुराती हुई ,वापस आ गयी और नीलिमा से बोली -अभी वो ,एक राउंड लगाने गए हैं।
ओह !वो ! कहते हुए नीलिमा मुस्कुराई और बोली - लगता है ,तुम इंस्पेक्टर साहब को पसंद करने लगी हो और इंस्पेक्टर साहब !
प्रभा मुस्कुराने लगी ,पता नहीं ,कहकर शरमा गयी।
नीलिमा को भी मस्ती सूझी ,बोली -तुम तो पहले से ही शर्मा हो ,इतना क्यों शरमा गईं ? तुम कहो तो आज इंस्पेक्टर साहब के दिल के रंग भी जान लेते हैं ,उनका दिल तुम्हारे प्यार में कितना रंगीन है ? कहकर दोनों हंस दीं।
एक बात पूछूं ,मैम !
पूछो !
आप ये तो जानती ही हैं ,मैं आपके जीवन पर अपनी कहानी लिख रही हूँ ,आपने जीवन देखा है। सर ,का ऐसे मौकों पर कैसा व्यवहार रहता था ?
नीलिमा को देखकर लगा ,जैसे वो अपनी ज़िंदगी के उन पलों को स्मरण ही नहीं करना चाहतीं ,बोलीं -जो हो गया ,सो हो गया ,हमें आज में जीना है ,हम अपने आज में बहुत ख़ुश हैं ,फिर त्यौहार में क्यों ख़लल डालना ?उन्हें देखकर लग रहा था ,वो पिछली किसी भी बात को कहना -सुनना नहीं चाहतीं।
प्रभा की भी ,और कुछ कहने की हिम्मत नहीं हुई ,वो तो चाहती थी -नीलिमा अपने और अपने पति के संबंधों की भी कुछ चर्चा करे। नीलिमा के इस व्यवहार से वो चुपचाप बैठ गयी।
कुछ देर के इंतजार के पश्चात ,इंस्पेक्टर साहब भी आ जाते हैं ,उनके हाथ में ,इस बार भी एक ट्रे थी ,जिसमें तीन कांच के गिलास थे। वो बोले -लीजिये साहिबान ! पीजिये ,कांजी का पानी ,जो बेहद ही स्वादिष्ट और सेहतमंद है।

