आज तो पूरी संस्था में अच्छे से सफाई की गयी है ,पतंगी कागजों से बनी रंगीन झालरें सजाई गयी हैं। लकडियों के लिए पेड़ो को नहीं काटना है ,इसी बात को ,ध्यान में रखते हुए , कुछ सूखी टहनियाँ ,घांस -फूँस और बेकार कागजों इत्यादि से एक छोटी सी'' होलिका ''बनाई गयी। हर किसी के चेहरे पर ख़ुशी थी। उन बच्चों के लिए तो नीलिमा का आना ही , एक त्यौहार जैसा हो जाता। वो जब भी आती कुछ नया कार्यक्रम करवाती। बच्चों से बातचीत करती , उसे देखते ही बच्चों के चेहरों पर, प्रसन्नता स्वतः ही छा जाती। आज तो त्यौहार भी है ,नीलिमा के घर से गाड़ी में कुछ आया है। गुझियों ,के साथ दही -बड़ों का सामान भी है और साथ में रंग भी है। कुछ अन्य लोग भी इन बेसहारा बच्चों के लिए कुछ न कुछ लाये हैं।
सभी को बताया गया ,शाम को जब होली का मुहूर्त होगा , होली जलाई जाएगी। तब तक सभी को पढ़ाई भी करनी होगी और अपना काम भी क्योंकि अगले दिन दुल्हैंडी है ,उसकी छुट्टी भी ,सभी रंग खेलेंगे। सभी बच्चों ने एक साथ शोर मचाया। नीलिमा उन्हें देखकर हंसने लगी।
टीना को इंस्पेक्टर विकास की बात पर जैसे विश्वास नहीं हुआ और वो आश्चर्य से बोली -क्या ऐसा हुआ होगा ?ये सब कौन और कैसे कर सकता है ?
इंस्पेक्टर ने बिना देरी किये कहा -हो सकता है ,वो तुम ही हो। अपना बदला लेना चाहती हो। उसके व्यवहार से तो तुम पहले ही खफ़ा थीं। उस दिन मौका मिला और अपनी योजना को अंजाम दे दिया हो।
व्हाट नॉनसेंस !ये आप क्या कह रहे हैं ? मैं भला ऐसा क्यों करने लगी ?
हो सकता है ,वो तुम्हारी ज़िंदगी को नर्क बना रहा हो ,या फिर तुम उसकी ख़ुशी से जलने लगीं हों।
मैं जलती तो ,मैं उसे छोड़ती ही क्यों ?
फिर तुम ,उसके घर के आस -पास क्यों मंडराती थीं ?
वो तो मैं उसकी बीवी को देखने गयी थी ,कि कहीं उसके साथ भी तो ,ऐसा ही कुछ नहीं कर रहा। वैसे आपको विश्वास नहीं होगा ,दरअसल मैं उसकी बीवी को उससे और उसकी हरकतों से आगाह करने गयी थी ,किन्तु जब मैंने ऐसा कुछ भी नहीं देखा जो मुझे गलत लगता हो ,तब मैंने उसकी पत्नी से कुछ नहीं कहा।
वैसे मैं भी, आपको एक बात बताना चाहता हूँ ,उसने, कितनी भी अपने दोस्तों से शर्त लगाई हो ?किन्तु वो तुम्हें ही सच्चे दिल से प्यार करता था। उस समय उसके मन में क्या आया ,क्या नहीं ?वो तो मैं नहीं जानता कि वो क्यों भाग गया ?किन्तु जिसे भी उसने सच्चे दिल से चाहा ,वो तुम ही हो ,तुम ही थीं।
इंस्पेक्टर की बात सुनकर टीना रोने लगी और बोली -जानती हूँ।
अबकि बार चौंकने की बारी विकास की थी ,और बोला -जानती हो !
हाँ ,मैं जानती हूँ ,जिस दिन मुझे उसकी दुर्घटना की खबर मुझे मिली उससे तीन दिन पहले वो मुझसे मिला था। बड़ा परेशान था।
किस कारण से ?
कह रहा था -'तुमसे दूर होकर मैं आज तक चैन से नहीं रह पाया हूँ ,मैंने तुम्हारा दिल दुखाया ,उसके लिए माफ़ी मांगता हूँ किन्तु आज भी मेरे दिल में तुम ही बसी हो। तुम्हारा दिल दुखाने की सज़ा भगवान मुझे तिल -तिलकर मारकर दे रहा है।'
तुमने पूछा नहीं ,वो ऐसा क्यों कह रहा है ?
मैंने पूछा भी ,तो कह रहा था -ये मेरे लिए सजा ही तो है ,एक औलाद दी वो भी ऐसी...... वो अपने बेटे के लिए दुखी था। कह रहा था -मैं खुद ही नहीं समझ पा रहा हूँ ,मैं क्या कर रहा हूँ ? क्यों जी रहा हूँ ?मुझे लगा ये मेरे सामने अपना कोई नया नाटक कर रहा है। जब तीन -चार दिन बाद उसकी ये खबर सुनी ,तो मैं एकदम से सकते में आ गयी। मैंने सोचा -वो शायद पहले से ही परेशान था और इसी कारण आत्महत्या की होगी।
एक बात और पूछना चाहता हूँ ,क्या तुमने पुलिस को फोन कर अपना संदेह जतलाया कि ये 'आत्महत्या' नहीं 'हत्या 'है।
नहीं ,मैंने कभी किसी को फोन नहीं किया ,न ही ,मुझे किसी पर कोई संदेह हुआ।
तुम तो शायद उसकी बीवी से मिली थीं।
हाँ , मिली थी ,किन्तु मेरी उससे कोई ज्यादा बात नहीं हुई।
उसे तो पता है कि तुम उसके कॉलिज की दोस्त थीं।
नहीं ,मैंने उसे कोई बात नहीं बताई।
तब उसे ,ये कैसे पता चला ?कि तुम उसकी कॉलिज की दोस्त थीं।
पता भी हो तो ,इससे क्या फ़र्क पड़ता है ?
ये तो महसूस करने वाला ही बता सकता है। अब चलता हूँ ,होली की आपको ढेर सारी शुभकामनायें !
आपको भी
शाम को लगभग आठ बजे ,''होलिका दहन ''का मुहूर्त था। सभी बच्चे खुश थे। होलिका जलाई गयी और बच्चों को इसका कारण भी समझाया गया। इस दिन ''भक्त प्रह्लाद ''की जीत हुई ,उसकी भक्ति में इतनी शक्ति थी कि उसका अग्नि भी कुछ नहीं बिगाड़ सकी। हमें अपने ईश्वर पर विश्वास होना चाहिए ,उन्हीं की भक्ति करते हुए, हमें सच्चाई की राह पर चलना चाहिए। कहते हुए नीलिमा ने अपना भाषण पूर्ण किया। प्रसाद के रूप में ,गुझिया और गेहूं की बाल जो उस अग्नि में पवित्र की थी ,बाँटी गयी ,साथ में लड्डू भी थे , भिजवाए थे। उसके पश्चात ,सभी को रंग -बिरंगे टीके लगाए गए। कुछ बच्चे तो ,उस समय भी रंग खेलने को आतुर थे किन्तु नीलिमा ने उन्हें समझाया -कल रंगवाली होली है ,कल खेलना ! कुछ बच्चों का तब भी खेलने का मन था किन्तु उन्हें अपना मन मारकर ,खाना खाकर सोना पड़ा किन्तु कल की मस्ती अभी से उनके दिलों -दिमाग़ पर छाई हुई थी।
आज सुबह -सुबह ही इंस्पेक्टर साहब को फोन आ गया -क्या हो रहा है ?इंस्पेक्टर साहब !कैसे हैं ?कब होली खेलने आ रहे हैं ?
अजी हमारे नसीब में होली कहाँ ?हमारी तो ड्यूटी लगी है ,हमें तो त्यौहार की छुट्टी नहीं मिलती। हम तो जनता के सेवक हैं।
दूसरी तरफ से ,बड़ी तेजी से हंसने की आवाज़ आई ,जनता ही तो आपको रंग लगाने के लिए बुला रही है।
प्रिय पाठकों ! अब तो आप समझ ही गए होंगे किसका फोन हो सकता है ? क्या इंस्पेक्टर साहब !होली खेलने जायेंगे या फिर कुछ नया ही गुल खिलेगा। जानने के लिए ,पढ़ते रहिये -'' ऐसी भी ज़िंदगी ''

