कभी-कभी इंसान अपनी परेशानियों में इतना मशरूफ हो जाता है, कि उसे अपने लिए समय ही नहीं मिलता। यदि एक महिला बाहर जाकर कमा रही है,वो भी दोहरी जिम्मेदारी जीती है किन्तु अपने लिए वो भी समय निकालने का प्रयास करती है। जो गृहणी है ,उसके काम की और समय की कोई सीमा नहीं होती ,वो तो कमाती भी नहीं ,इसीलिए सभी के काम करना और उनकी बातें सुनना उसका कर्त्तव्य बन जाता है। जब पति अपनी नौकरी पर चला जाता है, पत्नी अपने घर- परिवार में व्यस्त हो जाती है और दोनों का रिश्ता एक नियत दिनचर्या पर चलने लगता है। वो सारा दिन घर में रहती है ,पति शाम को थक- हारकर आराम करता है।
जिसके कारण रिश्ते में बोझिलता आने लगती है। दोनों पति-पत्नी को, अब अपनी जिम्मेदारियों के चलते, एक दूसरे से बात करने का समय भी कम ही मिल पाता है। यदि बात भी करते हैं ,तो काम की... एक -दूसरे की प्रशंसा करने का समय ही कहाँ मिलता है ? आज पत्नी ने क्या पहना है ? कुछ ध्यान ही नहीं रहता। यदि कभी -कभार पत्नी ने, पति से शिकायत भी की -'अब आप मुझ पर ध्यान नहीं देते हैं, तो झुंझलाकर कहते हैं -तुम्हें अब इश्क़ सूझ रहा है ,देखती नहीं हो ,सुबह का गया, शाम को घर लोेटता हूँ। अब उसे ये सब चोंचलेबाजी लगने लगती है।
विवाह से पहले कितनी ही बेफ़िजूल की बातें करते थे ,तब भी एक - दूसरे के लिए सोचते। एक -दूसरे के साथ समय व्यतीत करते किन्तु विवाह होने से पहले, जैसे ये एक टास्क था, विवाह के पश्चात पूर्ण हुआ।
विवाह के शुरुआती दिनों को छोड़कर, पत्नी को समय देना ,उसके लिए सोचना ,उसके लिए उपहार लाना ,ये सब अब उसे अच्छा नहीं लगता है। परिवार में एक बहु लाकर अपने उत्तरदायित्व पूर्ण कर वो निश्चिन्त हो जाता है। उसके पास अब समय ही नहीं है , प्रेम तो छोडो ! उसका दर्द सुनने ,उसकी परेशानी समझने का भी समय नहीं होता। उसे लगता है ,एक पत्नी को क्या चाहिए ? उसकी सभी ज़रूरतें पूरी तो हो रहीं हैं। उसकी ये लापरवाही कई बार, किसी दूसरे के लिए अच्छा मौका सिद्ध होती है।
अधिकतर पति -पत्नी के मध्य ,एक ऐसा इंसान आ जाता है। जो उस रिश्ते में पड़ती हल्के मनमुटाव ,कुछ शिकायतों की खिंचती रेखा को, बड़ी दरार में बदलने का प्रयास करता है। कभी पड़ोसी के रूप में ,देवर बनकर ,कभी कोई रिश्तेदार आकर उनके रिश्ते में ठहर जाता है और पत्नी तब कल्पना और तुलना करने लगती है ,'मेरे लापरवाह पति से बेहतर तो ये इंसान अच्छा है। या फिर पति का ही कोई दोस्त' भाभीजी' को अपने व्यवहार से मोहकर कब उनके जीवन में 'आग लगा जाता है ? स्वयं उन्हें ही पता नहीं चलता।
आजकल डिजिटल देवर ,कोई अज़नबी ,मेसेंजर ,व्हाट्स एप ,किसी भी एप के माध्यम से आपकी ज़िंदगी में प्रवेश करने का प्रयास करता है और जब उसका ये प्रयास सफल हो जाता है ,तब आपके रिश्ते में,उसे थोड़ी सी भी दरार की कहीं गुँजाइश मिलती है। तभी ये अज़नबी ' प्रेम के सौदागर बनकर , ज़िंदगी में कब प्रवेश कर जाते हैं ? पता ही नहीं चलता।
तब ऐसे में एक अजनबी आकर,पति -पत्नी के उस बोझिल होते रिश्ते में जान सी डाल देता है और किसी भाभी की दुखती नब्ज़ पर हाथ पड़ जाये तो, उससे बड़ा हमदर्द कोई नहीं। ऐसे ही ' दर्द को बाँट लेने वाले मसीहा ,उनको समझने वाले, नारी के दर्द को समझते हुए ,अपनी चिकनी -चुपड़ी बातों का मरहम लगाते हैं। जिस उम्मीद से वो स्त्री अपने पति की तरफ देखती हैं ,कभी तो वो मेरी या मेरे कार्य की प्रशंसा करेंगे। किन्तु पतिदेव इस सबसे लापरवाह अपनी ज़िंदगी में आगे बढ़ते रहते हैं। तब उसकी पत्नी अपने पति की लापरवाही से क्षुब्ध होती है। वो भावुक होकर अपने 'अनजान हमदर्द 'या फिर किसी' देवर' से अपना मन हल्का करने लगती हैं।
हालांकि उर्वशी उस अनजान अजनबी को जानती नहीं है। जानती तो अज़नबी कैसा ? किंतु अब उसकी बातों से उसके मन में खुशी की लहर सी दौड़ रही थी ऐसे लग रहा था ,जैसे जीवन में एक नई ताजगी भर गई हो। कुछ समय तकरार ही सही अपने तरीक़े से जीवन को जीती है । कभी उसे वीडियो भेजती ,भेजने से पहले समीर के लिए सोचती, समीर को भेजकर देखूं किन्तु तभी उसे लगता वो तो नाराज़ होगा।
और इस तरह से उसने,उस अजनबी इंसान को समय देना आरंम्भ कर दिया किंतु उसकी बातों में अपने आप को नहीं भूली। वो भी कभी कोई भी अवसर हाथ से जाने नहीं देता था। कभी फूल और उपहार भे जकर जन्म दिन की बधाई देता जबकि समीर भूल जाता। उससे बात करना तो उर्वशी को अच्छा लगता था।
उनकी बातों का कोई विषय नहीं होता था। बेफिजूल की यूं ही कुछ भी बातें हो रही होती है। जब व्हाट्सएप पर एक दिन उसका गुड मॉर्निंग का मैसेज आया। बातों ही बातों में उर्वशी ने एक दिन अपना व्हाट्सएप नंबर दे दिया था। तब अपने ट्रूकॉलर से , उर्वशी ने जानना चाहा, आखिर यह व्यक्ति कौन है ? उसके दिए नंबर पर' कस्तूरी देवी' का नाम आया। ये कितना चालाक है ,उसने तो न जाने किसके नाम से सिम कार्ड लिया हुआ था ?
जब उसका संदेश आया -सुप्रभात 🙏 तब उर्वशी ने उससे पूछा -और बताइए 'कस्तूरी 'जी कैसी हैं ?😀😀😀
वो न ही हिचकिचाया ,न ही परेशान हुआ ,बोला -वो तो अपने कामों में व्यस्त रहती है ,उसे मेरी परवाह ही कहाँ है ? सारा दिन अपने काम में लगी रहती है। मैं कस्तूरी नहीं हूं, मैं उस कस्तूरी का पति हूँ।
किन्तु जब मैंने ये नंबर लगाया ,'कस्तूरी 'नाम आया। मैंने सोचा -आपका नाम 'कस्तूरी ' ही होगा 😂😂😂
हंस लो !हंस लो ! ये उसी के नाम पर सिम ले रखा है।
क्या उसी के फोन से फोन करते हैं ,जिससे कभी पकड़े न जाएं ।
नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है, हम जो भी काम करते हैं सीना ठोक कर करते हैं ,उसने दावा किया।
तब उसने एक दिन उर्वशी से पूछा -क्या तुम्हारे पति ने तुमसे कभी कुछ पूछा नहीं।
वो, मुझसे क्यों कुछ कहेंगे ? उन्हें अपनी पत्नी पर विश्वास है। क्या आप हमारे पारिवारिक जीवन में झांकने का प्रयास कर रहे हैं, क्यों झांकना चाहते हैं ?😲😲
मैं झांकना नहीं चाहता हूं, मैं तो वैसे ही पूछ रहा था।क्या वो, हमेशा काम में ही व्यस्त रहते हैं। आपको कहीं घूमाने- फिराने नहीं ले जाते।
जब मुझे जाना होगा, मैं स्वयं चली जाऊंगी,😟😟😟 किसी से पूछ कर नहीं जाती हूं। उर्वशी ने सामने से ये कह तो दिया किन्तु मन ही मन उसके मन में भी समीर से शिकायत तो थी। ऐसे में ,उन्होंने न जाने कितनी बातें कीं ,जिनका कोई उद्देश्य नहीं था। बस हल्की सी नोकझोंक !
तब एक दिन उर्वशी ने कहा - अपनी डीपी पर यह फूल क्यों लगाए हुए हैं ?कम से कम अपनी पत्नी के साथ एक फोटो तो लगाइए। अब तो हमारी दोस्ती हो गई है।कहीं न कहीं उर्वशी के मन में जिज्ञासा थी आख़िर ये सी.बी एच. कौन है ? जब भी उर्वशी उसके विषय में जानने का प्रयास करती या उसके परिवार के विषय में जानना चाहती, वह बातों को गोल-मोल घुमा जाता।
